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पूंजीपतियों के चरणों में अर्पित पत्रकारिता- माखनलाल चतुर्वेदी

 

वर्तमान समय में पत्रकारिता के कर्तव्य, दायित्व और उसकी भूमिका को लोग संदेह से परे नहीं मान रहे हैं। इस संदेह को वैष्विक पत्रकारिता जगत में न्यूज ऑफ द वर्ल्ड और राश्ट्रीय स्तर पर राडिया प्रकरण ने बल प्रदान किया है। पत्रकारिता जगत में यह घटनाएं उन आषंकाओं का प्रादुर्भाव हैं जो पत्रकारिता के पुरोधाओं ने बहुत पहले ही जताई थीं। पत्रकारिता में पूंजीपतियों के बढ़ते प्रभाव के बारे में पत्रकारिता के महान आदर्ष माखनलाल चतुर्वेदी ने कहा था-

‘‘दुख है कि सारे प्रगतिवाद, क्रांतिवाद के न जाने किन-किन वादों के रहते हुए हमने अपनी इस महान कला को पूंजीपतियों के चरणों में अर्पित कर दिया है।‘‘ (पत्रकारिताः इतिहास और प्रष्न- कृश्ण बिहारी मिश्र)

भारत की पत्रकारिता की कल्पना हिंदी से अलग हटकर नहीं की जा सकती है, परंतु हिंदी पत्रकारिता जगत में भी अंग्रेजी षब्दों का प्रयोग बढ़ता जा रहा है। भाशा के मानकीकरण की दृश्टि से यह उचित नहीं कहा जा सकता  है माखनलाल चतुर्वेदी भाशा के इस संक्रमण से बिल्कुल भी संतुश्ट नहीं थे। उन्होंने कहा कि-

‘‘राश्ट्रभाशा हिंदी और तरूणाई से भरी हुई कलमों का सम्मान ही मेरा सम्मान है।‘‘(राजकीय सम्मान के अवसर पर)

राश्ट्रभाशा हिंदी के विशय में माखनलाल जी ने कहा था-

‘‘जो लोग देष में एक राश्ट्रभाशा चाहते हैं। वे प्रांतों की भाशाओं का नाष नहीं चाहते। केवल विचार समझने और समझाने के लिए राश्ट्रभाशा का अध्ययन होगा, बाकि सब काम मातृभाशाओं में होंगे। ऐसे दुरात्माओं की देष को जरूरत नहीं, जो मातृभाशाओं को छोड़ दें।‘‘(पत्रकारिता के युग निर्माता- माखनलाल चतुर्वेदी, षिवकुमार अवस्थी)

पत्रकारिता पर सरकारी नियंत्रण एक ऐसा मुददा है, जो हमेषा जीवंत रहा है। सरकारी नियंत्रण के बारे में भी माखनलाल चतुर्वेदी ने अपने विचारों को स्पश्ट करते हुए अपने जीवनी लेखक से कहा था-

‘‘जिला मजिस्ट्रेट मिओ मिथाइस से मिलने पर जब मुझसे पूछा गया की एक अंग्रेजी वीकली के होते हुए भी मैं एक हिंदी साप्ताहिक क्यों निकालना चाहता हूं तब मैंने उनसे निवेदन किया कि आपका अंग्रेजी साप्ताहिक तो दब्बू है। मैं वैसा समाचार पत्र नहीं निकालना चाहता हूं। मैं एक ऐसा पत्र निकालना चाहूंगा कि ब्रिटिष षासन चलता-चलता रूक जाए।‘‘ (पत्रकारिताः इतिहास और प्रष्न- कृश्ण बिहारी मिश्र)

माखनलाल चतुर्वेदी ने पत्रकारिता के ऊंचे मानदंड स्थापित किए थे, उनकी पत्रकारिता में राश्ट्र विरोधी किसी भी बात को स्थान नहीं दिया जाता था। यहां तक कि माखनलाल जी महात्मा गांधी के उन वक्तव्यों को भी स्थान नहीं देते थे, जो क्रांतिकारी गतिविधियों के विरूद्ध होते थे। सरकारी दबाव में कार्य करने वाली पत्रकारिता के विशय में उन्होंने अपनी नाराजगी इन षब्दों में व्यक्त की थी-

‘‘मैंने तो जर्नलिज्म में साहित्य को स्थान दिया था। बुद्धि के ऐरावत पर म्यूनिसिपल का कूड़ा ढोने का जो अभ्यास किया जा रहा है अथवा ऐसे प्रयोग से जो सफलता प्राप्त की जा रही है उसे मैं पत्रकारिता नहीं मानता।‘‘ (पत्रकारिताः इतिहास और प्रष्न- कृश्ण बिहारी मिश्र)

वर्तमान समय में हिंदी समाचारपत्रों को पत्र का मूल्य कम रखने के लिए और अपनी आय प्राप्त करने के लिए विज्ञापनों पर निर्भर रहना पड़ता है, क्योंकि पाठक न्यनतम मूल्य में ही पत्र को लेना चाहते हैं। हिंदी पाठकों की इस प्रवृत्ति से क्षुब्ध होकर माखनलाल जी ने कहा-

‘‘मुफ्त में पढ़ने की पद्धति हिंदी से अधिक किसी भाशा में नहीं। रोटी, कपड़ा, षराब और षौक की चीजों का मूल्य तो वह देता है पर ज्ञान और ज्ञान प्रसाधन का मूल्य चुकाने को वह तैयार नहीं। हिंदी का सबसे बड़ा षत्रु यही है।‘‘(पत्रकारिता के युग निर्माता- माखनलाल चतुर्वेदी, षिवकुमार अवस्थी)

माखनलाल चतुर्वेदी पत्र-पत्रिकाओं की बढ़ती संख्या और गिरते स्तर से भी चिंतित थे। पत्र-पत्रिकाओं के गिरते स्तर के लिए उन्होंने पत्रों की कोई नीति और आदर्ष न होने को कारण बताया। उन्होंने लिखा था-

‘‘हिंदी भाशा का मासिक साहित्य एक बेढंगे और गए बीते जमाने की चाल चल रहा है। यहां बरसाती कीड़ों की तरह पत्र पैदा होते हैं। फिर यह आष्चर्य नहीं कि वे षीघ्र ही क्यों मर जाते हैं। यूरोप में हर एक पत्र अपनी एक निष्चित नीति रखता है। हिंदी वालों को इस मार्ग में नीति की गंध नहीं लगी। यहां वाले जी में आते ही, हमारे समान, चार पन्ने निकाल बैठने वाले हुआ करते हैं। उनका न कोई आदर्ष और उददेष्य होता है, न दायित्व।‘‘

(इतिहास-निर्माता पत्रकार, डा. अर्जुन तिवारी)

पत्रकारिता को किसी भी राश्ट्र या समाज का आईना माना गया है, जो उसकी समसामयिक परिस्थिति का निश्पक्ष विष्लेशण करता है। पत्रकारिता की उपादेयता और महत्ता के बारे में माखनलाल चतुर्वेदी जी ने कर्मवीर के संपादकीय में लिखा था-

‘‘किसी भी देष या समाज की दषा का वर्तमान इतिहास जानना हो, तो वहां के किसी सामयिक पत्र को उठाकर पढ़ लीजिए, वह आपसे स्पश्ट कर देगा। राश्ट्र के संगठन में पत्र जो कार्य करते हैं। वह अन्य किसी उपकरण से होना कठिन है।‘‘(माखनलाल चतुर्वेदी, ऋशि जैमिनी बरूआ)

किसी भी समाचार पत्र की सफलता उसके संपादक और उसके सहयोगियों पर निर्भर करती है। जिसमें पाठकों का सहयोग प्रतिक्रिया की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। समाचारपत्रों की घटती लोकप्रियता के लिए माखनलाल जी ने संपादकों और पाठकों को जिम्मेदार ठहराते हुए लिखा था-

‘‘इनके दोशी वे लोग ही नहीं हैं जो पत्र खरीदकर नहीं पढ़ते। अधिक अंषों में वे लोग भी हैं जो पत्र संपादित और प्रकाषित करते हैं। उनमें अपने लोकमत की आत्मा में पहुंचने का सामर्थ्य नहीं। वे अपनी परिस्थिति को इतनी गंदी और निकम्मी बनाए रखते हैं, जिससे उनके आदर करने वालों का समूह नहीं बढ़ता है।‘‘(पत्रकारिता के युग निर्माता- माखनलाल चतुर्वेदी, षिवकुमार अवस्थी)

भारतीय पत्रकारिता अपने प्रवर्तक काल से ही राश्ट्र और समाज चेतना के नैतिक उददेष्य को लेकर ही यहां तक पहुंची है। वर्तमान समय में जब पत्रकार को पत्रकारिता के नैतिक कर्तव्यों से हटकर व्यावसायिक हितों के लिए कार्य करने में ही कैरियर दिखने लगा है। ऐसे समय में पत्रकारिता के प्रकाषपुंज माखनलाल चतुर्वेदी के आदर्षों से प्रेरणा ले अपने कर्तव्य पथ पर बढ़ने की आवष्यकता है।

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