5 राज्यों के विधानसभा चुनाव में बीजेपी ने उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में बहुमत हासिल कर लिया है। पूर्वोत्तर राज्य मणिपुर में भी वह कांग्रेस से आगे निकली है। खासतौर पर यूपी में बीजेपी का 300 सीटों के आंकड़े पर पहुंचना राजनीतिक विश्लेषकों को चौंकाने वाला है, लेकिन सेक्युलरिज्म के नाम पर लड़ने वाले दलों को यह सबक भी सिखाता है। पीएम नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में हुए इस चुनाव में यूपी के मतदाताओं ने जिस तरह से बीजेपी के पक्ष में रुख किया है, उससे साबित होता है कि कांग्रेस-एसपी और बीएसपी का सेक्युलर बनाम सांप्रदायिक का मुद्दा नहीं चला। कह सकते हैं कि बीजेपी की जीत और अन्य लोगों की हार का रहस्य इसी में छिपा है।

2002 से आगे नहीं बढ़ सके विपक्षी दल
यदि हम कांग्रेस, समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी की रणनीति देखें तो वह बार-बार सांप्रदायिक ताकतों को हराने और मुस्लिम मतदाताओं से साथ देने की अपील कर रहे थे। गुजरात दंगों के हवाले दिए जा रहे थे, लेकिन इन दलों को सोचना होगा कि घड़ी को रोक देने से वक्त नहीं थम जाता। 2002 से 2017 तक नरेंद्र मोदी और बीजेपी ने लंबा सफर तय किया है। यही वजह है कि वह राम मंदिर और धारा 370 जैसे मुद्दे को बहुत तूल नहीं देती है, इसके बाद भी उसे बड़ा समर्थन मिलता है। कह सकते हैं कि मोदी के नेतृत्व में बीजेपी को मिलने वाले समर्थन में हिंदुत्ववादियों के अलावा बड़ा हिस्सा उन लोगों का है, जो विकास की चाह रखते हैं। यानी पीएम नरेंद्र मोदी और बीजेपी ने अपनी विकास की छवि गढ़ने में सफलता पाई है, जबकि कांग्रेस, एसपी और बीएसपी 2002 से आगे नहीं बढ़े हैं।

उपेक्षित जातियों को दिखी बीजेपी में संभावना
बीजेपी ने विकास को मुद्दा बनाते हुए उन जातियों को साधने का काम किया है, जिन्हें एसपी, बीएसपी और कांग्रेस हाशिये पर रख रहे थे। कुम्हार, लुहार, बढ़ई, कुर्मी, मल्लाह, कोरी, स्वर्णकार और अन्य कम संख्याबल वाली जातियों को बीजेपी ने अपनी ओर लुभाने का काम किया है। इसकी वजह यह है कि ये सभी जातियां बीते 20 सालों से एसपी और बीएसपी में अपने वजूद को तलाश रही थीं। शायद यही वजह है कि इन जातियों ने केंद्र में ओबीसी का चेहरा बने पीएम मोदी और राज्य में केशव प्रसाद मौर्य में अपने लिए संभावनाएं देखीं।

नरेंद्र मोदी का टारगेट करने का हुआ नुकसान
यदि विपक्ष के नेता के तौर पर मुझे रणनीति बनानी हो तो मेरा फोकस अपनी पॉजिटिव कैंपेनिंग करने पर होगा। इससे उलट यूपी समेत देश भर में विपक्षी दल नरेंद्र मोदी को निशाना बनाते रहे हैं। आमतौर पर देखा गया है कि यदि किसी लोकप्रिय नेता पर विपक्षी हमला करते हैं तो उसकी लोकप्रियता में इजाफा हो जाता है। ऐसे में विपक्षी दलों को पीएम मोदी पर निशाना साधने की बजाय अपनी उपलब्धियों और अजेंडे का बखान करने पर ध्यान देना होगा।

अल्पसंख्यकवाद पड़ गया भारी
गैर-बीजेपी दल लंबे समय से मुस्लिम और जातिगत समीकरण को साधकर जीत का गणित बिठाती रही हैं। समाजवादी पार्टी मुस्लिम और यादव गठजोड़, बीएसपी मुस्लिम और दलित गठजोड़ के जरिए राजनीति करती रही हैं। लेकिन ऐसी राजनीति तभी सफल होती है, जब बहुसंख्यक समाज के बड़े तबके का समर्थन हो। जमीनी हकीकत यह है कि कांग्रेस और एसपी के प्रति बहुसंख्यक समाज में यह संदेश गया है कि ये दल अल्पसंख्यकवाद की राजनीति करते हैं। वहीं, मायावती की बीएसपी भी इसी तरह की राजनीति के चलते अपने कोर वोट बैंक को भी जोड़ने में असफल रही है। कह सकते हैं कि आने वाले वक्त में इन दलों को अपनी अल्पसंख्यकवादी छवि को तोड़ने के लिए काम करना होगा।

(नवभारत टाइम्स डॉट कॉम में प्रकाशित ब्लॉग)

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