तीन तलाक पर इन दिनों तीखी बहस चल रही है। टीवी ऐंकर और भाजपाई प्रवक्ता मौलवियों पर जोरदार हमले कर रहे हैं और साथ में बैठी पीड़िताएं अपना दर्द बयां कर रही हैं। इनके जवाब में मौलवियों और मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड जैसी संस्थाओं से जुड़े लोगों के तर्क हैं- हिंदुओं में तलाक ज्यादा होते हैं, तीन तलाक न हो तो महिला ही मार दी जाए और यह शिगूफा इस्लाम के खिलाफ रचा गया है। पीड़ित महिलाओं को वे उठाकर लाया गया बता रहे हैं। ये और ऐसे तमाम तर्क बताते हैं कि वे भीतर से कितने कमजोर हैं और कैसे अपनी नाइंसाफियों के जवाब में दूसरे लोगों की गलत हरकतों का हवाला दे रहे हैं।

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संविधान निर्माता बाबासाहेब भीमराव आंबेडकर

समस्या की जड़ यहीं है कि पैनल में बैठे कुछ लोग सीधे मौलवियों पर हमला बोल रहे हैं और जवाब में वे हिंदुओं में जारी कुरीतियों का हवाला दे रहे है। इस तरह मौलवी तीन तलाक के विरोध को मुस्लिम कौम के खिलाफ साजिश बताने की कोशिश में हैं। हकीकत यह है कि मनुष्य का स्वभाव है कि उसे यदि कोई दूसरा उसकी खामियां बताता है तो वह आमतौर पर उसे गलत ढंग से लेता है। उसे लगता है कि उनकी कौम और समाज को नीचा दिखाने या उपहास के लिए ऐसा किया जा रहा है। अब तक किसी भी समाज में जो बदलाव हुए हैं, आमतौर पर उनके भीतर से ही आवाज उठने पर हुए हैं। तीन तलाक पर मुस्लिम महिलाएं मुखर हुई हैं तो लगता है कि बदलाव होगा, लेकिन इसे मुकम्मल करने के लिए किसी आंबेडकर की जरूरत है। वरना बहस एक दूसरे पर कीचड़ उछालने से आगे नहीं बढ़ेगी और हालात जस के तस घुटन भरे रहेंगे।

आज के दौर में देखें तो मुस्लिम समाज की नुमाइंदगी और उनके हकों की रक्षा के नाम पर राजनीति करने वाले तमाम नेता दिखते हैं। असल में ये मुस्लिम नेता ही उनके भीतर सुधार की पहल कर सकते हैं। लेकिन, ये लोग मदरसों को फंडिंग, कब्रिस्तानों की चारदीवारी, लाउडस्पीकर और बीफ बैन जैसे मुद्दों से आगे नहीं बढ़ पा रहे हैं। ऊपरी स्तर पर ऐसे मुस्लिम नेताओं को अभाव दिखता है, जो अंग्रेजी शिक्षा, सेक्युलरिजम और राष्ट्र के प्रति समर्पण में पहली कतार में आने की वकालत करते दिखें। इसकी बजाय वंदे मातरम का विरोध, सेना का विरोध, मोदी-योगी को गालियां और पीड़ित महिलाओं का अपमान किया जा रहा है। यदि ऐसा रहा तो सुधार की गुंजाइश नहीं है, बल्कि आने वाले दिनों में समाज का पिछड़ापन और बढ़ ही सकता है।

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अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के संस्थापक सर सैयद अहमद खां

इतिहास से सीखें तो मिलेगी मदद
सर सैयद अहमद खां ने 1877 में ऑक्सफर्ड और कैंब्रिज विश्वविद्यालयों की तर्ज पर अलीगढ़ में ऐंगलो ऑरियंटल कॉलेज की स्थापना की थी। यही बाद में अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के तौर पर स्थापित हुआ। वह पहले व्यक्ति थे, जिन्होंने मुस्लिमों के विकास के लिए अंग्रेजी की शिक्षा की वकालत की थी। हालांकि द्विराष्ट्र सिद्धांत की वकालत करने वाले भी वह पहले व्यक्ति थे, जिसके बारे में फिर बात करेंगे। लेकिन मुस्लिम समाज के लिए उनके प्रयासों का बड़े पैमाने पर असर उस वक्त दिखा था और आजादी से पूर्व भारत में मुस्लिमों की शिक्षा का औसत करीब-करीब हिंदुओं के समान ही था। लेकिन, आजादी के बाद मुस्लिम समाज इस स्थिति को बरकरार रखने में नाकामयाब रहा तो इसमें तत्कालीन सरकारों के अलावा उनके अपने नेतृत्व का बड़ा योगदान रहा। सैयद अहमद खां ने जिस दौर में मुस्लिमों की आधुनिक शिक्षा की वकालत की थी, तब हिंदू समाज में इस बारे में बहुत विचार नहीं था। लेकिन, आज मुस्लिम समाज में एक बड़ा तबका परंपरागत धार्मिक शिक्षा ही ले रहा है और यही उसके पिछड़ेपन की मूल वजह है। लेकिन, इसमें किसी भी तरह के सुधार की कोशिश को इस्लाम पर हमले की तरह पेश किया जाता है।

एक आंबेडकर चाहिए बदलाव के लिए
भीमराब आंबेडकर ने दलितों के उत्थान के लिए नारा दिया था, ‘लड़ो लड़ाई पढ़ने को, पढ़ो समाज बदलने को।’ आज दलितों में उत्थान की जो स्थिति दिखती है, उसमें सबसे बड़ा योगदान आंबेडकर का ही है। लेकिन, यह उत्थान ‘दलित खतरे में हैं’ के नारे या फिर परंपरागत कामों को जारी रखकर नहीं आया है। इस सुधार के लिए आंबेडकर ने दलितों की शिक्षा, महिलाओं के अधिकारों और समाज में बराबरी के स्थान की वकालत की थी। मुस्लिम समाज को आंबेडकर से सीखते हुए महिलाओं को बराबरी का दर्जा देने की पहल करनी चाहिए। इसके लिए उन्हें एक आंबेडकर की जरूरत है, जो उनके बीच से ही हो सकता है। फिलहाल तो इसकी कमी दिखती है। जितनी जल्दी मुस्लिम समाज में आंबेडकर उभरेंगे उतना ही अच्छा होगा। कोई भाजपाई प्रवक्ता, टीवी के ऐंकर, अखबारों के लेखक उनकी समस्या का समाधान नहीं कर सकते।

(नवभारत टाइम्स डॉट कॉम में प्रकाशित ब्लॉग)

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