‘दलित ईसाइयों को बड़े पैमाने पर छुआछूत और भेदभाव का शिकार होना पड़ता है। देश भर के कैथलिक चर्च में 5,000 से ज्यादा बिशप हैं, लेकिन इनमें दलित ईसाइयों की संख्या महज 12 है।’ यह किसी दक्षिणपंथी नेता का दावा नहीं है, बल्कि भारत के कैथलिक चर्च की स्वीकारोक्ति है। इतिहास में पहली बार इंडियन कैथलिक चर्च ने यह स्वीकार किया है कि जिस छुआछूत और जातिभेद के दंश से बचने को दलितों ने हिंदू धर्म को त्यागा था, वे आज भी उसके शिकार हैं। वह भी उस धर्म में जहां कथित तौर पर उनको वैश्विक ईसाईयत में समानता के दर्जे और सम्मान के वादे के साथ शामिल कराया गया था।

देश में कैथलिक चर्च के कुल 1.9 करोड़ सदस्य हैं, इनमें से 1.2 करोड़ दलित ईसाई यानी हिंदू धर्म से बरगलाकर लाए गए लोग हैं। कैथलिक बिशप्स कॉन्फ्रेंस ऑफ इंडिया द्वारा ‘पॉलिसी ऑफ दलित इम्पावरन्मेंट इन द कैथलिक चर्च इन इंडिया’ नाम से प्रकाशित 44 पेज की रिपोर्ट के मुताबिक, ‘चर्च में दलितों से छुआछूत और भेदभाव बड़े पैमाने पर मौजूद है। इसे जल्द से जल्द खत्म किए जाने की जरूरत है।’ यह रिपोर्ट शायद उन लोगों की आंखें खोल सके, जो ईसाई मिशनरियों के धर्मांतरण को न देखने के लिए ‘गांधारी’ बने बैठे हैं। वामपंथी और कुछ दलित चिंतक अक्सर कहते हैं कि जो हिंदुत्व दलितों को बराबरी नहीं दे सकता, उससे निकल जाना ही बेहतर है। इस रिपोर्ट के बहाने उन्हें यह बताना चाहिए कि आखिर वे हिंदुत्व से निकलकर भी दलदल में क्यों हैं?

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दिल्ली में अपने हकों के लिए आवाज उठाते दलित ईसाई

अक्सर ऐसे बुद्धिजीवी दो अलग-अलग शब्दों, दलित और हिंदू, का इस्तेमाल करते हैं। इसके लिए उनका तर्क है कि हिंदू तो सिर्फ सवर्ण हैं और दलितों को अधिकार ही नहीं तो हिंदू कैसे? अब वे बताएंगे क्या कि ईसाई तो कुछ गिने-चुने बिशप हैं, और दलित तो दलित ही हैं। कैथलिक चर्च की रिपोर्ट में कहा गया है कि दलितों के साथ अन्याय हो रहा है और चर्च के भी तरह बदलाव की जरूरत है ताकि उन्हें पर्याप्त अधिकार दिए जा सकें। आजादी के 70 साल बीत गए और धर्मांतरण उससे पहले से भी जारी है, आखिर अब तक दलितों को ईसाईयत के हक क्यों न मिल सके। यदि उन्हें ईसाई धर्म में भी छुआछूत और भेदभाव के साथ ही जीना है तो फिर हिंदू धर्म में ‘घर वापसी’ करने का विकल्प कहां गलत है? यहां कम से कम उन्हें आरक्षण तो मिलेगा।

चर्च की नीयत में खोट और नेताओं को चाहिए सिर्फ वोट
इसी रिपोर्ट में कैथलिक चर्च ने दोहराया है कि हम लंबे समय से दलित ईसाइयों को आरक्षण दिलाने के लिए लड़ रहे हैं और यह उन्हें मिलना ही चाहिए। रिपोर्ट में सुप्रीम कोर्ट की ओर से दलित ईसाइयों को आरक्षण दिए जाने की मांग को खारिज किए जाने की भी आलोचना की गई है। वामपंथी चिंतक और चर्च के पैरोकार कहते हैं कि ईसाई मिशनरी का उद्देश्य सिर्फ सेवा करना है। यदि ऐसा है, तो मिशनरी और चर्च उन्हें ईसाई धर्म में भेदभाव और छुआछूत के साथ गुलाम क्यों बनाए हुए हैं? उन्हें हिंदू धर्म में वापसी के लिए प्रेरित क्यों नहीं करते, जहां उन्हें आरक्षण मिल सके और स्वधर्म में बराबरी का हक भी। आखिर ईसाई के तौर पर ही उन्हें दलित बनाए रखने की जिद क्यों? क्या किसी चिंतक के पास है इसका जवाब? राजनीतिक दलों से इस बारे में कुछ उम्मीद करना बेमानी होगा, जिन्हें सिर्फ दलितों का वोट चाहिए। भले ही नवबौद्ध बनकर दें, दलित ईसाई के तौर पर दें या फिर इस्लाम की निचली कड़ी से जुड़कर।

धर्मांतरण अब भी जारी है, अब किसकी बारी है?
देश का मीडिया और नीति-निर्माण के पदों पर दशकों से बैठे रहे वामपंथी चिंतक ईसाई मिशनरियों द्वारा धर्मांतरण किए जाने की हकीकत को नकारते रहे हैं। लेकिन, इस धर्मांतरण और धर्मांतरण से राष्ट्रांतरण के स्मारक आपको गांवों से लेकर शहरों तक में देखने को मिल जाएंगे। एक उदाहरण मैं दे रहा हूं, जब चाहे देख लीजिएगा। दिल्ली से लखनऊ को जोड़ने वाले नैशनल हाईवे-24 के पास गाजियाबाद के विजय नगर इलाके में कुछ वर्ष पूर्व तक कृष्णा नगर नाम की एक बस्ती थी। आज इसे क्रिश्चियन नगर बागू के नाम से जाना जाता है। बस्ती आज भी दलितों की ही कहलाती है, लेकिन अब यहां हिंदू नहीं रहते बल्कि मिशनरी की फसल लहलहाती है। मिशनरी में काम करने वाले लोग खुद इनके बीच नहीं रहते। पॉश कॉलोनियों से सुबह इन्हें बरगलाने आते हैं और शाम तक स्कूल और चर्च में कथित सेवा करते हैं और लौट जाते हैं। कृष्णा नगर बागू से क्रिश्चियन नगर बने इस इलाके के दलित अब भी दलित ही हैं, उनकी हालत नहीं बदली है। लेकिन मिशनरी के लोगों ने इनके दिलोदिमाग में हिंदू समाज और भारत के प्रति पहले की अपेक्षा नफरत का भाव जरूर पैदा कर दिया है।

(नवभारत टाइम्स डॉट कॉम में प्रकाशित ब्लॉग)

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