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आरएसएस के लोगों पर महात्मा गांधी की हत्या का आरोप लगाने, मुकरने और फिर मानहानि केस में डटने का फैसला लेकर राहुल गांधी ने बहुत समझदारी का परिचय नहीं दिया है। एक कुशल राजनेता के लक्षण यह होते हैं कि पहले तो वह बोलता ही तौल कर है और गलती से कुछ गड़बड़ हो जाए तो माफी मांगने से नहीं हिचकता। राहुल ने इनमें से किसी भी तरह की समझदारी नहीं दिखाई, हालांकि वह इसके लिए जाने भी नहीं जाते। राहुल ने सीधे तौर पर आरएसएस से जुड़े लोगों को महात्मा गांधी की हत्या के लिए जिम्मेदार ठहरा दिया। उनके इस आरोप में कितनी सच्चाई है, इसके लिए हमें कुछ तथ्यों पर नजर डालनी होगी।

महात्मा गांधी की हत्या के बाद संघ पर लगे प्रतिबंध का हवाला देते हुए वामपंथी इतिहासकार इस मामले में आरएसएस को जिम्मेदार ठहराते रहे हैं। लेकिन, इससे बड़ा तथ्य यह रहा है कि आरएसएस पर जिस नेहरू सरकार ने बैन लगाया और गुरु गोलवलकर को गिरफ्तार किया था, उसी सरकार ने संघ पर से बैन हटाया भी था। कुछ लोग सरदार पटेल और नेहरू के बीच हुए पत्र व्यवहार के हवाले से संघ को जिम्मेदार ठहराने की कोशिश करते रहे हैं। इस थिअरी में बड़ा झोल है। यह सच है कि पटेल ने नेहरू को लिखे एक पत्र में आरएसएस पर सांप्रदायिक तनाव पैदा करने का आरोप लगाया था। सिर्फ इसके आधार पर ही वामपंथी लेखक संघ पर गांधी हत्या का कलंक लगाने की कोशिश में रहते हैं।

पटेल ने दी थी आरएसएस को क्लीन चिट

दरअसल, यह तथ्यों की चोरी का मामला है। सरदार पटेल ने गृह मंत्री की हैसियत से प्रधानमंत्री नेहरू को 27 फरवरी, 1948 को लिखे पत्र में कहा था, ‘आरएसएस इस सबमें शामिल नहीं था। यह हिंदू महासभा की एक अतिवादी विंग थी, जिसने सावरकर के नेतृत्व में गांधी हत्या की साजिश रची।’उनका यह पत्र सीधे तौर पर आरएसएस को क्लीन चिट है। हालांकि अदालत में विनायक दामोदर सावरकर के खिलाफ लगे आरोप भी साबित नहीं हो सके। खास बात यह है कि सावरकर ने अपना मुकदमा खुद लड़ा और तथ्यों की जंग में जीत गए।

जुलाई, 1948 में संघ से बैन हटाने की मांग करते हुए नेहरू मंत्रीमंडल के सदस्य श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने पटेल को पत्र लिखकर संघ पर लगे बैन को हटाने और मुस्लिम समुदाय के एक वर्ग को ‘देशद्रोही’ बताया था। इस पत्र के जवाब में पटेल ने लिखा था, ‘आरएसएस की गतिविधियां सरकार और राज्य के समक्ष खतरा पैदा करती हैं। जहां तक मुस्लिमों की बात है, मैं आप से पूरी तरह सहमत हूं कि कुछ लोग देश के प्रति वफादार नहीं हैं और खतरा साबित हो सकते हैं।’

जाहिर है कि कांग्रेस के नेता होने की वजह से पटेल की कुछ सीमाएं थीं और वह आरएसएस का खुलकर समर्थन नहीं कर सकते थे। आखिर वह दूसरे ध्रुव पर जो खड़े थे। लेकिन, वामपंथी इतिहासकार इस तथ्य के एक सिरे को ही पकड़ते हैं, संघ की निंदा को तो उन्होंने हाथोंहाथ लिया, लेकिन मुस्लिम समुदाय के कट्टरवादी तबके के बारे में की गई उनकी टिप्पणी को हजम कर गए। यह सभी तथ्य सरदार पटेल पर प्रकाशित पुस्तक ‘कलेक्टड वर्क्स ऑफ सरदार वल्लभभाई पटेल’ में मौजूद हैं। लेकिन, वामपंथी इन तथ्यों का सुविधा के अनुसार इस्तेमाल करते रहे हैं।

कट्टर मुस्लिमों को पटेल ने दिया था पाक जाने का ऑफर

6 जनवरी, 1948 को लखनऊ में एक जनसभा को संबोधित करते हुए पटेल ने कट्टरवादी मुस्लिमों को चेताते हुए कहा, ‘आप लोग कश्मीर में पाकिस्तान के हमले की निंदा क्यों नहीं करते? आप दो घोड़ों की सवारी नहीं कर सकते। आप को एक घोड़ा चुनना होगा। जो लोग पाकिस्तान जाना चाहते हैं, वह जा सकते हैं और वहां शांति से रह सकते हैं।’

गांधी हत्या पर गठित आयोग ने दी क्लीन चिट

महात्मा गांधी की हत्या से जुड़े तथ्यों की पड़ताल के लिए तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने 1965 में जेएल कपूर आयोग गठित किया था। इस आयोग ने 1969 में रिपोर्ट सौंपी थी, जिसमें आरएसएस या आरएसएस के लोगों (जैसा राहुल गांधी का कहना है) को किसी भी तरह से जिम्मेदार नहीं माना गया। यहां तक कि महाराष्ट्र सरकार की ओर से सीआईडी और पुलिस कमिश्नर से मांगी गई रिपोर्ट में भी संघ पर कोई आरोप नहीं लगा। आयोग ने जिन लोगों से गवाही ली, उनमें से किसी ने भी गांधी हत्या के मामले में संघ की संलिप्तता को लेकर कोई बात नहीं की। अलबत्ता, संघ को विभाजन की त्रासदी में पाकिस्तान से लुट-पिटकर आने वाले हिंदुओं की मदद करने वाला संगठन करार दिया।

(नवभारत टाइम्स डॉट कॉम में प्रकाशित ब्लॉग)

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