India Kashmir Top Rebel Killed

Kashmiri villagers grieve by the body of Burhan Wani, chief of operations of Indian Kashmir’s largest rebel group Hizbul Mujahideen, during his funeral procession in Tral, some 38 Kilometers (24 miles) south of Srinagar, Indian controlled Kashmir, Saturday, July 9, 2016. Indian troops fired on protesters in Kashmir as tens of thousands of Kashmiris defied a curfew imposed in most parts of the troubled region Saturday and participated in the funeral of the top rebel commander killed by Indian government forces, officials and locals said. (AP Photo/Dar Yasin)

मौत। हर इंसान का अंत एक दिन इसके साथ ही होता है, लेकिन जीवन भर उसके कामों के हिसाब से ही मौत के बाद उसे जाना जाता है। कई बार तो उसके कामों के आधार पर ही तय होता है कि उसे कौन सी मौत मिलेगी। तो हिज्बुल मुजाहिदीन के आतंकी बुरहान वानी को जो मौत मिली, वह उसके कर्मों के मुताबिक ही थी। होश संभालने के साथ ही यह लड़का आतंकी संगठन में शामिल हो गया था, आतंक का पोस्टर बॉय बना और 22 साल की उम्र में ही एक एनकाउंटर में वह ढेर हो गया। ढेर हो गया या फिर कर दिया गया, यह किसी आतंकी या गैंगस्टर के लिए ही लिखा जाता है। सामान्य लोगों का निधन होता है और महान आत्माएं तो ‘खुद’ अपना शरीर त्याग देती हैं।

मौत के उल्लेख का यह वर्गीकरण व्यक्ति के कर्मों के मुताबिक ही है। इसके बावजूद भी ऐसे कई कथित बुद्धिजीवी पाए जा रहे हैं, जो अपनी कलमकारिता से यह बताने में जुटे हैं कि बुरहान वानी ‘क्रांतिकारी’ था और उस आतंकी की तुलना भगत सिंह और चंद्रशेखर आजाद की शहादत से कर रहे हैं यानी उसकी मौत को शहीद होना बता रहे हैं।

ऐसे लोगों ने यह कुत्सित प्रयास पहली बार नहीं किया है। इनकी कलमें पहले भी अफजल गुरु और याकूब मेमन की फांसी के विरोध में चली थीं। इस तबके की विशेषता यह है कि ये तथ्यों और तर्कों को तोड़-मरोड़कर पेश करने की महारथ रखते हैं। किस उदाहरण को कहां इस्तेमाल कर दें, इसका भी कोई अंदाजा नहीं लगाया जा सकता।

कुछ मीडिया समूह और तथाकथित उदारवादी तो एक तरह से कैंपेन चला रहे हैं और बताने में जुटे हैं कि कैसे बुरहान वानी कश्मीरियों के लिए शहीद था। तर्कों की दुष्टता यहां तक कि कश्मीर की ‘आजादी’ की मांग की तुलना भारत के स्वतंत्रता आंदोलन से कर रहे हैं। ऐसे ही कुछ तर्कों के जवाब-

एक बेटा जायदाद बेचने का फैसला नहीं ले सकता

जम्मू-कश्मीर के 2,22,236 वर्ग किलोमीटर के क्षेत्रफल में से 1,01,387 वर्ग किलोमीटर का इलाका भारत के हिस्से में है। इसमें से 26,293 वर्ग किमी में जम्मू बसा है, जबकि 59,146 किलोमीटर का क्षेत्रफल लद्दाख का इलाका है, बाकी बचा 15,948 वर्ग किमी का हिस्सा कश्मीर घाटी का है। यानी कश्मीर घाटी का क्षेत्रफल लद्दाख और जम्मू की तुलना में बेहद कम है।

कथित तौर पर आजादी की मांग करने वालों का बहुमत इसी इलाके में बसता है, लेकिन अलगाववादी संगठन और इनके समर्थक लेखक समूह इसे पूरा राज्य की मांग बताने पर तुले हैं। अगर किसी घर में 3 बेटे हों (जम्मू, लद्दाख और कश्मीर) तो फिर कश्मीर से पूछकर ही आजादी का फैसला क्यों होना चाहिए। फिर इसी कश्मीर घाटी में आधा हिस्सा उन कश्मीरी पंडितों और सिखों का है, जिन्हें अमानवीय प्रताड़नाएं देकर इस्लामिक आतंकवादियों ने उनके घर से खदेड़ दिया। आज वह दर-दर की ठोकरें खा रहे हैं। इन लोगों का भी जम्मू-कश्मीर के जर्रे-जर्रे पर उतना ही हक है, जितना घाटी के अलगाववादियों का।

पूरा जम्मू-कश्मीर अशांत नहीं

अलगाववाद समर्थक लेखक समूह तथ्यों को तोड़-मरोड़कर पेश करते हुए यह साबित करने में जुटे रहते हैं कि पूरा जम्मू-कश्मीर ही अशांत है। ऐसा नहीं है, जम्मू और लद्दाख में कभी कोई पत्थर नहीं उछला। कश्मीर घाटी की समस्या भी किस तरह से अलगाववादियों की देन है, यह भी किसी से छिपा नहीं है।

पिछले दिनों ही एक अलगाववादी नेता के बेटे ने कहा था कि गोली खाने के लिए गरीब ही क्यों हैं, आखिर इन नेताओं के बेटे खुद बंदूकें लेकर क्यों नहीं उतरते? साफ है कि इस समस्या की जड़ में पाकिस्तान के पैसों से फल-फूल रहे अलगाववादी और वे आतंकवादी हैं, जो सूबे में इस्लामी निजाम की स्थापना के लिए गोलियां चला रहे हैं। बुरहान की मां ने भी एक न्यूज पोर्टल से बातचीत में कहा है, ‘मेरा बेटा इस्लामी निजाम के लिए मरा, काफिरों से लड़ते हुए।’

यह जंग बर्बादी की है

इन आतंकियों और अलगाववादियों को अपनी कलम से खाद-पानी देने वाले लोग इसे आजादी का संघर्ष बताते हुए बुरहान जैसों की तुलना भगत सिंह से करते हैं। ध्यान देने की जरूरत है कि भारत के स्वतंत्रता आंदोलन की आग पूरे देश में धधक रही थी। ऐसा नहीं था कि किसी राज्य में आजादी की जंग न चल रही हो। कश्मीर में एक विशेष समुदाय के कुछ भटके हुए लोग आतंकवाद की राह पर निकल पड़े हैं, इसे आजादी की जंग कैसे कहा जा सकता है?

इन आतंकियों के परिवार के लोग तो खुद स्वीकार कर रहे हैं कि उनके बेटे इस्लामी निजाम की स्थापना के लिए मरे हैं। एक तथ्य और कि आजादी की जंग में इस्लामिक स्टेट जैसे खूंखार आतंकी संगठनों के झंडे नहीं लहराए जाते। IS के झंडे लेकर जो जंग लड़ी जा रही हो, वह आजादी की तो नहीं बर्बादी की जरूर हो सकती है।

(नवभारत टाइम्स डॉट कॉम में प्रकाशित ब्लॉग)

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