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बीते कुछ दशकों में भारतीय राजनीति को यदि सबसे बड़ा नुकसान हुआ है तो वह है ‘वामपंथ का बर्बादी की ओर बढ़ना’। जेएनयू में कुछ वामपंथी विचारधारा के छात्रों की ओर से भारत विरोधी नारे लगाने से लेकर रोहित वेमुला की मौत पर राजनीतिक रोटियां सेंकने, याकूब की फांसी पर अनर्गल विलाप करने, मालदा पर चुप्पी साधने, बीफ पार्टियां करने, कश्मीर की आजादी के नारों का समर्थन करने तक ऐसी तमाम हरकतें इस बात की बानगी हैं कि वामपंथ अब आत्मघाती राह पर है। वामपंथी संगठनों की ओर से इस तरह के अनर्गल मुद्दे उठाना यह साबित करता है कि उनके पास रचनात्मक मुद्दों की कमी हो गई है, या वह कम मेहनत पर ज्यादा फसल काटना चाहते हैं।

यह सही है कि भारत माता की वंदना करने में वामपंथी विचारधारा के लोगों को कभी दिलचस्पी नहीं रही, सैनिकों को वह सरकारी लठैत कहते रहे हैं, अदालत (याकूब मेमन और अफजल गुरु के मामले में) यदि उनकी सोच के अनुकूल फैसला न दे तो उस पर भी सवाल उठाने लगते हैं। अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर वह यह सब करते रहे हैं। भले ही भारतीय वामपंथ की वैचारिक प्रेरणा के स्रोत कहे जाने वाले चीन और रूस में इस तरह की आजादी न हो (थ्येन मेन चौक का गोलीकांड याद रखना चाहिए), लेकिन भारत में मिलती रही है। यह तभी संभव हुआ है, जब भारत में स्थिरता रही है, लोकतंत्र मजबूत रहा है और यह सहिष्णु देश आबाद रहा है। लेकिन, सोचिए यह देश बर्बाद हो जाए और टुकड़े हो जाएं तो क्या इस तरह की आजादी किसी को मिल सकेगी?

वामपंथी राजनीति हो या दक्षिणपंथी, हर तरह की राजनीति तभी चल सकेगी, जब यह देश रहेगा। यदि भारत ही बर्बाद हो जाएगा तो फिर क्या? लेकिन वामपंथी खेमा 16 मई, 2014 के बाद से इतनी अधीरता और बौखलाहट में आ गया है कि गालियों की भाषा में बात करने लगा है। कभी सभ्यता और पढ़ाई-लिखाई को अपनी बपौती मानने वालों के नारे ऐसे हो गए हैं कि सड़क छाप गुंडे भी शरमा जाएं, ‘नीम का पत्ता कड़वा है, नरेंद्र मोदी… है।’ मेरा सवाल है कि मित्रो, आप ऐसा क्यों कर रहे हैं?

आपके या दूसरे खेमे के लोगों की विचारधारा अलग हो सकती है, लेकिन हैं तो सब भारतीय ही न? भारत की मंगलकामना तो देश में हर विचार के व्यक्ति को करनी ही चाहिए। लेकिन, दुर्भाग्य से वामपंथी राजनीति मतिभ्रम का शिकार हो गई है, अभिव्यक्ति की आजादी की बात करते-करते वह देशद्रोहियों की गोद में जानकारी बैठ गई है। वामपंथ का ऐसा चरित्र पहले न देखा था।

वाजिब मुद्दे उठाने से बढ़ेगा आधार

हालिया सरकार की ही बात करें तो एक तरफ कॉरपोरेट जगत को भारी सब्सिडी विकास के नाम पर दी जा रही है। वहीं, किसानों की सब्सिडी में कटौती की जा रही है। बैंकों के लाखों करोड़ रुपये एनपीए में चले गए हैं, यह कर्ज कंपनियों ने ले रखा था। सरकार उसे भूल नया पैकेज जारी करने की तैयारी में है, जबकि किसान की जमीन 50 हजार के कर्ज पर भी नीलाम हो जाती है। मजदूरों का बुरा हाल है, उस पर भी राजस्थान और अन्य बीजेपी शासित राज्यों में श्रम सुधार कानूनों के नाम पर गरीबों का हक मारा जा रहा है। रोजगार के अवसर छीने जा रहे हैं, लेकिन वामपंथी मौन साधे हैं। यह वह रचनात्मक मुद्दे हैं, जिनका विरोध कर वह अपनी खोई जमीन हासिल कर सकता है। इसके लिए उसे देशद्रोहियों की भाषा नहीं बोलनी पड़ेगी। हिंदू-मुसलमान की बजाय मजदूर, दलित-सवर्ण की बजाय वामपंथ यदि किसान की बात करे तो उसकी सेहत के लिए ज्यादा अच्छा रहेगा। मजदूर और किसान में हिंदू, मुसलमान, सवर्ण और दलित तक सभी शामिल हैं।

सीखना होगा विपक्ष में रहना

पिछले कुछ दिनों से वामपंथी बुद्धिजीवी और ऐक्टिविस्टों का जो स्वर है, वह विरोध से ज्यादा बौखलाहट प्रतीत होता है। मेरे कई मित्र हैं, जो कह रहे हैं कि 16 मई, 2014 की तारीख के बाद से देश का माहौल बिगड़ गया है। एक बड़े इतिहासकार ने तो आरएसएस की तुलना इस्लामिक स्टेट से कर दी। बिना किसी तथ्य के इस तरह की बात करना बौखलाहट नहीं तो क्या है? कुछ लोगों ने पुरस्कार वापसी का ही अभियान छेड़ दिया, वह भी सिरे नहीं चढ़ा। फिर रोहित वेमुला की आत्महत्या को दलित उत्पीड़न करार देकर राजनीतिक रोटियां सेंकने लगे, वहां से भी खाली हाथ लौटना पड़ा। इसकी वजह यही थी कि उनके मुद्दे रचनात्मक नहीं थे। उनका विरोध सिर्फ विरोध के लिए था। दरअसल, करीब 7 दशकों में इतनी बुरी तरह हाशिये पर जाने की स्थिति वामपंथियों ने कभी नहीं झेली थी, लेकिन मित्रो, ऐसा दौर भी आता है, राजनीति में आपको विपक्ष में भी रहना सीखना होगा। इस मामले में वामपंथी मित्र वैचारिक तौर पर अपने कट्टर विरोधी संगठन आरएसएस से भी सीख सकते हैं, जो दशकों तक सत्ता से दूर रहा, लेकिन भारत की बर्बादी की कामना कर कभी सत्ता में आने की कोशिश नहीं की।

बदलाव खुद से शुरू करना होगा

‘पर उपदेश कुशल बहुतेरे’। यह बात वामपंथ पर एकदम सटीक लगती है। यह सही है कि आरएसएस और कांग्रेस समेत तमाम राजनीतिक दल दलितों एवं समाज के पिछड़े तबकों को उनका वाजिब हक देने में असफल रहे हैं। लेकिन वामपंथी दलों और विचारकों को अपने भीतर भी झांकना चाहिए। बीते 51 सालों में सीपीएम के पोलित ब्यूरो में यदि एक भी दलित को जगह नहीं मिल सकी है तो यह किसकी कमी है? क्या वहां भी आरएसएस के चलते दलितों को नेतृत्व में हिस्सा नहीं मिल सका? रोहित वेमुला के मामले में रोना मचाने वाले मित्रों को इन सवालों का भी जवाब देना होगा कि नक्सलियों का नेतृत्व भी ब्राह्मणों के हाथ में ही क्यों है और मरने को दलित ही क्यों हैं? साफ है कि वामपंथ को खुद से बदलाव की शुरुआत करने की जरूरत है।

(नवभारत टाइम्स डॉट कॉम में प्रकाशित ब्लॉग)

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