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जेएनयू में पिछले दिनों कुछ छात्रों ने जब कश्मीर की कथित आजादी को लेकर नारेबाजी की तो एक बार फिर समूचे देशवासियों का ध्यान राष्ट्र के इस महत्वपूर्ण हिस्से की ओर गया। आमतौर पर जम्मू-कश्मीर की चर्चा दिल्ली या अन्य हिस्सों में तभी होती है, जब कोई विवाद होता है या सरकार गठन का कोई मसला होता है। लेकिन, आज 22 फरवरी की तिथि इस प्रदेश और देश के लिहाज से बेहद अहम है। आज ही के दिन 1994 को भारत की संसद ने पाक अधिकृत जम्मू-कश्मीर को वापस लेने का संकल्प दोहराया था। (22 अक्टूबर 1947 को पाकिस्तानी कबाइलियों और सेना ने अचानक हमला बोल राज्य के बड़े हिस्से पर कब्जा जमा लिया था।)

फिलहाल जम्मू-कश्मीर के 2,22,236 वर्ग किलोमीटर के क्षेत्रफल में से 1,01,387 वर्ग किमी का इलाका भारत का है। इसमें से 26,293 वर्ग किमी में जम्मू बसा है, जबकि 59,146 किलोमीटर का क्षेत्रफल लद्दाख का इलाका है, बाकी बचा 15,948 वर्ग किमी का हिस्सा कश्मीर घाटी का है। इसके अलावा जम्मू-कश्मीर रियासत का 78,114 वर्ग किमी हिस्सा पाकिस्तान के कब्जे में है। यही नहीं चीन ने भी भारत के इस अहम हिस्से के 37,555 किमी क्षेत्रफल पर अपना कब्जा जमा रखा है। वहीं, पाकिस्तान ने चीन को अपने कब्जाए इलाके में से 5,180 वर्ग किमी हिस्सा चीन को सौगात के तौर पर सौंप दिया है।

इन आंकड़ों को यहां इसलिए दोहराया गया ताकि हमें इस बात का अहसास हो सके कि देश का कितना बड़ा हिस्सा पाकिस्तान और चीन के कब्जे में चला गया है। इसी हिस्से को वापस पाने के लिए भारत की संसद ने अपना संकल्प दोहराया था, यहां से निर्वाचित होने वाले 22 विधायकों के लिए आज भी राज्य विधानसभा में 22 सीटें खाली पड़ी हैं। लेकिन, दुखद बात यह है कि हम इस संकल्प पर रत्ती भर भी आगे नहीं बढ़े हैं। उल्टे माहौल यह पैदा हो गया है कि कुछ देशद्रोही तत्व मौजूदा जम्मू-कश्मीर को भी भारत से छीनने के नारे दे रहे हैं। यहां मेरा मंतव्य उन नारों में जाना नहीं है, लेकिन सरकार समेत पूरे समाज को इस बात की ओर ध्यान देने की आवश्यकता है कि हमने क्या खोया और क्या पाया है।

1994 के बाद से अब तक झेलम में बहुत पानी बह चुका है, लेकिन हम उस खोए हिस्से को पाने के कोई प्रयास करते नहीं दिखे हैं। कांग्रेस की सरकार हो या राष्ट्रवाद के नाम पर सत्ता में आने वाली बीजेपी, कोई भी दल इस मामले में प्रयास नहीं कर सका है।

उल्टे ऐसा माहौल तैयार हो गया है, जैसे हम इस हिस्से को ही भूल गए हों। 22 साल पहले पारित इस प्रस्ताव की हम चर्चा भी नहीं करते। रणनीतिक मोर्चे पर भारत सरकार की यह बड़ी चूक है, एक तरफ हम दक्षिण चीन सागर में चीन से लोहा लेने की तैयारियां करने की बात करते हैं, वहीं देश का ही एक बड़ा हिस्सा चीन और पाक के कब्जे में है और हमारी राजनीतिक सत्ता मौन है।

पाक और चीन के कब्जे में गया यह इलाका रणनीतिक तौर पर कितना महत्वपूर्ण है, इस बात का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि गिलगित-बल्तिस्तान के पूरे क्षेत्रफल को पाकिस्तान ने चीन को ही सौंपने का ऑफर दे दिया है। यही नहीं चीन ने तिब्बत से लेकर पाकिस्तान के ग्वादर बंदरगाह तक रेल नेटवर्क तैयार करने का भी काम शुरू कर दिया है, यह इसी इलाके से होकर गुजरेगी। भारत दोतरफा घिर रहा है, लेकिन हम मौन हैं।

अकसर पाकिस्तान संयुक्त राष्ट्र में जाकर जम्मू-कश्मीर के मुद्दे को उठाने की कोशिश करता है और हमारी सरकार बचाव करती दिखती है कि इस पर तो बात ही नहीं होनी चाहिए। मेरा सवाल है कि यह रक्षात्मक रवैया क्यों, हम यह पक्ष क्यों नहीं रखते कि बात होनी चाहिए लेकिन इस पर कि पाकिस्तान अवैध रूप से कब्जाए इलाके से अपना कब्जा कब छोड़ेगा? पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर की जो दुर्दशा पाक सरकार और आतंकियों ने कर रखी है, उस मुद्दे को भी हमें संयुक्त राष्ट्र में उठाना चाहिए। 26 बरस पूरे हो चुके हैं, यह वक्त कम नहीं होता।

गिलगित के रहने वाले शिंगे हसनेन शेरिंग ने पिछले साल अपने भारत दौरे के वक्त इस बात का जिक्र किया था कि इस इलाके में किस तरह से चीन और पाक स्थानीय लोगों का दमन कर रहे हैं। वहां का एक तबका आज भी भारत से जुड़ने की चाह रखता है, लेकिन हमारी सरकार है कि इस मसले पर कुंभकर्णी नींद से जागने का नाम ही नहीं ले रही। वहीं, तिब्बत को पहले ही लील चुका चीन इस इलाके के रणनीतिक महत्व को समझते हुए इसे भी डकारने और भारत की घेरेबंदी की कोशिशों में जुटा है। अब वक्त आ गया है, जब भारत के टुकड़े करने के नारे लगाने वाले लोगों पर कार्रवाई के साथ ही भारत को अपने उन हिस्सों को भी सहेजने की कोशिश करनी चाहिए, जिन्हें षड्यंत्र और छलपूर्वक उससे छीन लिया गया है।

गिलगित-बल्तिस्तान का रणनीतिक महत्व

गिलगित-बल्तिस्तान का क्षेत्र करीब 90 हजार वर्ग किलोमीटर है, जिसमें से 20 हजार वर्ग किमी हिस्सा चीन के कब्जे में है। गिलगित-बल्तिस्तान की सीमाएं अफगानिस्तान, कजाकिस्तान, पाकिस्तान, चीन व भारत के साथ लगी हैं। इसी कारण चीन अपनी विस्तारवादी एवं दादागिरी की नीयत से इस इलाके में अपनी पैठ बढ़ा रहा है, ताकि उसका चारों ओर से भारत को घेरने का मकसद भी पूरा हो सके। गिलगित-बल्तिस्तान के रणनीतिक महत्व को इस बात से ही समझा जा सकता है कि पूर्व में इसकी सीमाएं सोवियत यूनियन तक से लगती थीं। अंग्रेजों ने मध्य एशिया में अपनी पैठ बनाने के मकसद से 1935 में महाराजा हरिसिंह से समझौता कर गिलगित-बल्तिस्तान इलाके को लीज पर ले लिया था। इस इलाके की सुरक्षा व प्रशासन की जिम्मेदारी अंग्रेजों के हाथ में थी। 1947 में इस क्षेत्र को उन्होंने महाराजा को वापस कर दिया। इसकी सुरक्षा के लिए अंग्रेजों ने एक अनियमित सैनिक बल गिलगित स्काउट का भी गठन किया था।

(नवभारत टाइम्स डॉट कॉम में प्रकाशित ब्लॉग)

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