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‘गुड फ्राइडे का हमारे लिए धार्मिक महत्व है। लिहाजा यह जरूरी हो जाता है कि हम इस तरह के महत्वपूर्ण धार्मिक त्योहारों पर वह अपने माता-पिता, बड़े-बुजुर्गों और परिवार के साथ रहें।‘ सुप्रीम कोर्ट के मान्य न्यायाधीश जोसेफ कुरियन ने बीते शनिवार को पीएम की ओर से न्यायाधीशों के लिए आयोजित डिनर में शामिल होने में असमर्थता जताते हुए यह उद्गार व्यक्त किए। खबरों के मुताबिक उन्होंने पीएम को लिखे शिकायती पत्र में गुड फ्राइडे वाले वीकेंड पर न्यायाधीशों का सम्मेलन बुलाने पर भी नाराजगी जताई और कहा कि इस मौके पर वह अपने परिवार के साथ केरल में छुट्टियां मना रहे हैं, लिहाजा वह नहीं आ सकते। वह गए भी नहीं। लेकिन उनके पत्र ने जो ‘सेकुलर‘ हवा फैलाई थी, उसका असर डिनर से लेकर तीन दिवसीय सम्मेलन तक में दिखा।

जस्टिस कुरियन के पत्र ने न्यायपालिका के धर्म को लेकर तो एक नई बहस खड़ी ही की है, बल्कि एक नागरिक एवं कर्मचारी के कर्तव्यों को लेकर भी नाहक बहस को जन्म देने का काम किया। कुरियन साहब ने अपने पत्र में भारत के धर्मनिरपेक्ष चरित्र का हवाला देते हुए कहा कि दुनिया हमारी इस उदारता से जलन करती है और हमें अपने इस उदार ढांचे को बरकरार रखना चाहिए। इसलिए दिवाली, ईद, दशहरा और क्रिसमस आदि पर्वों पर किसी तरह के महत्वपूर्ण आयोजन नहीं किए जाने चाहिए। लेकिन जस्टिस कुरियन खुद इतना तो जानते ही होंगे कि हमारी यह धर्मनिरपेक्षता सिर्फ इसीलिए बरकरार है, क्योंकि हमारे देश में ‘न्याय देवता‘ का कोई धर्म नहीं है और वह सिर्फ सबूतों के आलोक में फैसला सुनाता है। लेकिन जब हमारे माननीय न्यायाधीश ही हिंदू, ईसाई या मुसलमान हो जाएंगे तो फिर कल्पना की जा सकती है कि हमारी न्यायपालिका का चरित्र क्या होगा! फिर कैसे वह संविधान के धर्मनिरपेक्ष मूल्यों की रक्षा कर पाएगी ? यह सच है कि हमारा देश उत्सवधर्मी है, हिंदू कैलेंडर के मुताबिक तो करीब हर तीसरे दिन कोई न कोई पर्व होता है। फिर ईसाई, मुस्लिम, सिख एवं पारसी समुदायों के पर्वों को मिला लें तो समझा जा सकता है कि हमारे उत्सवों का कैलेंडर कितना व्यस्त होगा।

पर्वों को पूरी उत्सवधर्मिता के साथ मनाना ही चाहिए। लेकिन तस्वीर का दूसरा पहलू यह भी है कि एक धर्म और सबसे बड़ा कर्म हमारी जिम्मेदारी भी है, जिसका हर परिस्थिति में निर्वाह करना ही चाहिए। फिर न्यायपालिका के बारे में तो कहा जाता है कि उसके लिए न दिन होता है न रात। कोई भी न्याय के लिए रात के 12 बजे भी ‘माई लाॅर्ड‘ का दरवाजा खटखटा सकता है, क्या कुरियन साहब न्याय के इस सिद्धांत से अपरिचित हैं ? इसके अलावा अस्पताल के इमरजेंसी विभाग, रेलवे, सड़क परिवहन, हवाई यातायात, पुलिस, सीमा पर तैनात सेना, पत्रकार आदि चैबीसों घंटे सातों दिन काम करते हैं, क्या सरकार उनके धर्म पर किसी तरह का प्रहार कर रही है, नहीं। शायद सैनिक का पहला धर्म सीमा की सुरक्षा करना और पत्रकार का धर्म सूचना को जनता तक पहुंचाना है। इसी तरह से अन्य विभाग भी अपने स्तर से हर वक्त मुस्तैद रहते हैं। लेकिन जिस तरह की बेतुकी बहस को मान्य न्यायाधीश ने खड़ा करने का प्रयास किया, वह खुद कहीं न कहीं इस तरह के संकेत देता है कि वह अपने अंतर्मन में कहीं पूर्वाग्रह से ग्रसित हैं। कुरियन जोसेफ की आपत्ति के बीच एक महत्वपूर्ण तथ्य यह भी है कि 2007 में भी न्यायाधीशों का यही सम्मेलन गुड फ्राइडे के दिन हुआ था। जबकि 2008 और 2009 में क्रमशः महावीर जयंती और स्वतंत्रता दिवस के मौके पर हुआ था।

हालांकि इस बार भले ही जोसेफ कुरियन ने पत्र लिख नाहक विवाद खड़ा किया हो, लेकिन दो हाईकोर्टों के ईसाई मुख्य न्यायाधीश पूरे कार्यक्रम में मौजूद रहे। जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस पाॅल वसंथकुमार और उत्तराखंड के केएम जोसेफ ने पूरे आयोजन में सक्रिय मौजूदगी दर्ज कराई। वसंथकुमार भी पक्के ईसाई हैं, लेकिन सम्मेलन से उनके धर्म पर कोई प्रहार नहीं हुआ। वसंथकुमार ने विवाद के संदर्भ में कहा, ‘मैं गुड फ्राइडे के मौके पर सुबह ही चर्च गया था और उसके बाद सम्मेलन में आया।‘ सचमुच किसी भी न्यायाधीश या अन्य सेवाओं में लगे किसी कर्मचारी का यही धर्म होना चाहिए। हालांकि सबसे सकारात्मक बात रही कि न्यायपालिका की ओर से खुद ही इस मामले को दुर्भाग्यपूर्ण बताते हुए आपस में सुलझाने की बात कही गई है। उम्मीद है कि कुरियन भी अपने धर्म को समझेंगे और जैसा कि खुद उन्होंने कहा कि दुनिया भारत की धर्मनिरपेक्षता की मिसाल देती है, उस पर कोई आंच नहीं आने देंगे।

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