Ram-Bahadur-Ray
राम बहादुर राय जी को पद्म श्री मिलना पत्रकारिता के अलंकरण के सम्मान सरीखा है। सहज ढंग से बड़े-बड़े काम करते जाना और क्या मिलेगा इसकी  परवाह किए बिना लगे रहना राय साहब जैसे विरले लोगों के ही बस का काम है। जहां पत्रकारिता में ग्लैमर देखकर नई पीढ़ी आ रही हो और खुद मीडिया की निष्पक्षता संदेह के दायरे में हो, ऐसे वक्त में वह एक जीवंत उदाहरण है कि मिशनरी पत्रकारिता किस तरह से की जा सकती है। 1 जुलाई, 1946 को  उत्तर प्रदेश के गाजीपुर जिले के सेनारी गांव में जन्में राम बहादुर राय ने दसवीं तक की पढ़ाई गांव में ही की और उसके बाद वाराणसी आकर उच्च शिक्षा  प्राप्त की। बीएचयू से राजनीतिक विज्ञान में स्नातक और अर्थशास्त्र में परास्नातक करने के दौरान ही वह छात्र संगठन एबीवीपी के संपर्क में आए थे। यहीं से उनके मन में एक्टिविज्म जागा और पढ़-लिखकर महज करने नौकरी की बजाय उनके मन में सामाजिक परिवर्तन में योगदान करने की उत्कंठा थी। उनकी यह ललक उस वक्त पूरी हुई, जब 1971 में एक सेमिनार के दौरान उनकी मुलाकात जय प्रकाश नारायण से हुई। लोकनायक की सलाह पर वह उन दिनों बांग्लादेश में चल रहे आंदोलन को देखने गए। लेकिन 40 दिनों के बाद जब वह लौटे तो उन्होंने अपने इरादे और दिशा तय कर ली थी।
राय साहब ने उसी दौर में तय कर लिया कि नौकरी की बजाय सामाजिक क्षेत्र में काम करेंगे। जेपी आंदोलन में लालू यादव, कर्पूरी ठाकुर, रविशंकर प्रसाद और सुशील मोदी सरीखे नेताओं के साथ उन्होंने सक्रिय भूमिका अदा की। 1974 में 10 महीने के लिए जेल भी गए। आंदोलन की समाप्ति के बाद तमाम लोगों ने राजनीतिक क्षेत्र में कैरियर की तलाश शुरू की, लेकिन राय साहब ने लोकसभा या विधानसभा चुनाव लड़ने को लक्ष्य से समझौता करने जैसा माना। उनके मन का एक्टिविस्ट अभी जिंदा था और उन्होंने राजनीति के गलियारे में जाने की बजाय सक्रिय पत्रकारिता की राह चुनी। एक पत्रकार के रूप में एक्टिविस्ट और एक्टिवस्टि के तौर पर पत्रकार दोनों ही भूमिकाओं का राय साहब ने अपने पत्रकारीय जीवन में सफलतापूर्वक निर्वाह किया है। भले ही एबीवीपी से उनकी नजदीकी जगजाहिर थी, लेकिन जनसत्ता जैसे अखबार में उन्होंने तटस्थ भाव से दक्षिणपंथी संगठनों की खामियों को भी निर्ममता से उजागर किया। नवभारत टाइम्स और जनसत्ता अखबार में उन्होंने राजेंद्र माथुर और प्रभाष जोशी सरीखे पत्रकारों के साथ काम किया। देश के नामी पत्रकारों में से रहे, लेकिन उन्होंने इस प्रतिष्ठा को कभी अपने हित में नहीं भुनाया। जनसत्ता से अलग होने के बाद उन्होंने कई वर्षों तक प्रथम प्रवक्ता पत्रिका का संपादन किया और आजकल यथावत पत्रिका का संपादन कर रहे हैं। जिसमें उनकी कलम आज भी तटस्थ भाव से लिख रही है और राजनीतिक-सामाजिक क्षेत्र के स्याह पहलुओं को उजागर करने में जुटी है।
क्या एक्टिविस्ट सही ढंग से पत्रकारिता कर सकता है, इसके जवाब में वह कहते हैं, ‘सार्थक पत्रकारिता वही कर सकता है, जिसमें समाज के प्रति सरोकार और विचार हो। जो कहने को पेशेवर पत्रकार हैं, वह महज नौकरी करते हैं। हो सकता है कि अच्छा काम करते हों, लेकिन अपने यहां जो पत्रकारिता की कसौटी है, उसमें खरे नहीं उतरते। इसलिए एक पत्रकार को सामाजिक कार्यकर्ता होना ही चाहिए। राम बहादुर राय ने जेपी आंदोलन में आदर्शों के लिए लड़ने वाले सिपाहियों को भ्रष्ट राजनेता बनते, जेपी के मूल्यों को ढहते और बिखरते देखा। लेकिन, जिस आंदोलन में वह खुद सक्रिय थे, उसकी असफलता से वह व्यथित जरूर हुए, भ्रमित कभी नहीं। पत्रकारिता की राह चुनकर राय साहब ने अपने मूल्यों को साकार किया और समाज को निरंतर नई दिशा देने का प्रयास किया। अपने किए के लिए सम्मान की अपेक्षा उनके मन में कभी नहीं रही। जिस वक्त में पुरस्कारों पर भी विवाद हो, सम्मान भी करीबी जनों को अर्पित किए जाते हों, राय साहब हमेशा निर्विकार भाव से काम में लगे रहे। यही वजह है कि शायद इतने दिनों बाद उन्हें पद्म श्री से नवाजा गया। सही अर्थों में कहा जाए तो उन्हें पद्म श्री मिलना पत्रकारिता के पद्म के सम्मान जैसा है। राय साहब के साथ ही टीवी पत्रकार रजत शर्मा और वरिष्ठ स्तंभकार स्वप्न दास गुप्ता को भी पद्म विभूषण से सम्मानित किया गया।

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