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भारत की बढ़ती आबादी और उसके अनुपात में सिमटते संसाधनों को लेकर समाजशास्त्रीय बहसों में अकसर चिंता जताई जाती रही है। यह सच भी है कि हम आजादी के बाद से अब तक करीब चौगुने (33 करोड़ से 121 करोड़) हो गए हैं। जिसके चलते रोजगार, खेती योग्य भूमि, बेहतर पर्यावरण समेत तमाम मूलभूत सुविधाओं में कमी आई है। देश में आबादी के नियंत्रण के लिए इंदिरा काल से लेकर अब तक कई छिटपुट प्रयास हुए हैं, लेकिन सभी प्रयास धार्मिक स्वतंत्रता और ‘धर्मनिरपेक्षता‘ नामक तत्व की भेंट चढ़ गए। जिसका परिणाम है कि भारत की आबादी निरंतर निर्बाध गति से आगे बढ़ती रही।
हालांकि देश के बड़े वर्ग ने जनसांख्यिकी में इजाफे को लाभप्रद न मानते हुए आबादी की बढ़ोतरी में ‘स्वनियंत्रण‘ किया। लेकिन यह सोच एक वर्ग तक ही सीमित रही, जबकि देश के दूसरे हिस्से में उत्तरोतर संख्या बढ़ती रही। आजादी के छह दशकों के दौरान हुई जनगणनाओं में अवश्य ही यह तथ्य सामने आया होगा, लेकिन हमारे नीति-नियंताओं और जनमाध्यमों ने इसका खुलासा करने से ‘धर्मनिरपेक्षता‘ के नाम पर लगातार परहेज किया। जिसका परिणाम यह हुआ कि आज देश की आबादी में विभिन्न वर्गों के प्रतिनिधित्व में खासा अंतर आ गया है। अभी भारत सरकार ने 2011 की जनगणना के आंकड़ों को रिलीज नहीं किया है। लेकिन, जो आंकड़ा गैरआधिकारिक रूप से सामने आया है, वह बीते कई दशकों से लगाए जा रहे कयासों की तथ्यपरकता साबित करता है।
2001-2011 की जनगणना के आंकड़ों के मुताबिक वर्ष 1951 में देश की आबादी में हिंदुओं का प्रतिनिधित्व 84.1 फीसदी था, जो 2011 में महज 78.35 (उसके बाद और कमी की संभावना) फीसदी रह गया, यानी छह दशकों में करीब छह फीसदी की गिरावट आई। साफ समझा जा सकता है कि जनसंख्या के आंकड़ों को धर्म के आधार पर जारी न करके दिखाई गई कथित धर्मनिरपेक्षता और मीडिया की यह रायशुमारी कि एक वर्ग की आबादी में खास इजाफा नहीं हो रहा है और ऐसा है तो उसकी वजह अशिक्षा और गरीबी है, के आवरण में ही किस तरह से देश की जनसांख्यिकी में चिंताजनक परिवर्तन हो गया। मीडिया ने हमेशा ही जनसंख्या की बहस के सामने आते ही शुतुरमुर्गी रवैया अपनाने का काम किया, स्टैंड लेकर काम करने वाले मीडिया ने जैसे इस समस्या को ही सिरे से खारिज कर दिया।
अभी हाल के वर्षों तक जो लोग जनसांख्यिकी में परिवर्तन और एक खास वर्ग की आबादी में विशेष बढ़ोतरी का मुद्दा उठाते थे, उन्हें सिरफिरा और उपद्रवी जमात का घोषित करने का प्रयास हुआ। लेकिन, वह सिरफिरे सच निकले! और सभी तर्क बेनकाब हो गए। इसके अलावा मीडिया के एजेंडे में घुसपैठ भी हमेशा ‘बेवजह का बवाल‘ रही, लेकिन सामने आए आंकड़ों से साबित हुआ है कि बांग्लादेश के पड़ोस में बसे राज्यों में किस तरह से मुस्लिम आबादी में विस्फोट हुआ। यह सहज रूप से बढ़ी आबादी नहीं है, निश्चित तौर पर एक खास तबके से संबंधित लोगों की बांग्लादेश से बड़े पैमाने पर घुसपैठ हुई है। आंकड़ों के मुताबिक 2001 में असम राज्य में मुस्लिम आबादी का प्रतिनिधित्व करीब 31 फीसदी था, जो 2011 में 34 फीसदी से अधिक हो गया। जबकि पश्चिम बंगाल में मुस्लिम आबादी में 2001 में 25.2 प्रतिशत थी, जबकि 2011 में यह आंकड़ा 27 फीसदी हो गया। (आम चुनाव में भी घुसपैठ था मुद्दा)
10 साल में 24 फीसदी बढ़ी मुस्लिम आबादी 
वर्ष 2001-11 के बीच देश में मुसलमानों की आबादी राष्ट्रीय औसत 18 प्रतिशत के विपरीत जहां 24 प्रतिशत बढ़ गई है, वहीं इस दौरान वृद्धि दर में पांच फीसदी की गिरावट भी आई है। धार्मिक समूहों की आबादी पर जनगणना के आंकड़ों के अनुसार कुल आबादी में समुदाय का प्रतिनिधित्व 13.4 प्रतिशत से बढ़कर 14.2 प्रतिशत हो गया है। राज्यों के नजरिए से जम्मू-कश्मीर सर्वाधिक मुस्लिम आबादी (67 से बढ़कर 68.3ः) वाला राज्य है। वर्ष 1991 से 2001 के बीच मुस्लिम आबादी की वृद्धि दर करीब 29 प्रतिशत थी, वहीं 2001-11 में यह घटकर 24 प्रतिशत रह गई। पांच प्रतिशत की गिरावट के बावजूद मुस्लिम आबादी में 24 प्रतिशत वृद्धि दर दशक (2001-11) के लिए 18 प्रतिशत के राष्ट्रीय औसत से अधिक गृह मंत्रालय के तहत महापंजीयक और जनगणना आयुक्त ने मार्च, 2014 तक आंकड़े संकलित कर लिए थे, लेकिन पिछली संप्रग सरकार ने इन्हें जारी नहीं किया था।
असम में बढ़ी सर्वाधिक आबादी 
मुसलमानों की आबादी सर्वाधिक तेज गति से असम में बढ़ी है। राज्य में 2001 में मुसलमानों की जनसंख्या कुल जनसंख्या का 30.9 प्रतिशत थी और बाद के दशक में यह बढ़कर 34.2 प्रतिशत हो गई है। पश्चिम बंगाल में मुसलमानों की आबादी 2001 के आंकड़े 25.2 प्रतिशत से बढ़कर 2011 में 27 प्रतिशत हो गई है। असम और पश्चिम बंगाल ऐसे राज्य हैं जो कई दशकों से बांग्लादेश से अवैध घुसपैठ की समस्या का सामना कर रहे हैं। आंकड़े यह उजागर करते हैं कि घुसपैठ लगातार हो रही है और देश के भीतर के तत्व ही उन्हें शरण दे रहे हैं।
मुस्लिम आबादी का यह प्रतिनिधित्व दोनों ही राज्यों में राजनीतिक तौर पर निर्णायक की भूमिका में आ गया है। यही वजह है कि जब बांग्लादेशी घुसपैठियों को देश से निकालने की बात होती है तो ममता बनर्जी जैसे नेता उनके प्रति खासे ममतामयी हो जाते हैं। जबकि मीडिया को यहां भी सांप्रदायिकता प्रतीत होती है। बीते कुछ सालों में मीडिया ने मुस्लिम समाज को जबरन एक पीड़ित पक्ष के तौर पर पेश करने का स्वांग रचा है। घुसपैठ का मुद्दा उठाओ तो मुस्लिम उत्पीड़न, बढ़ती आबादी की बात करो तो सांप्रदायिकता। लेकिन कभी भी इस वजह से राष्ट्रीय स्तर पर और खुद भारत के अभिजात्य मुस्लिमों के लिए बढ़ी समस्या को संबोधित करने का काम मीडिया ने नहीं किया। यहां तक कि घुसपैठ को ही उन्होंने बनावटी करार देने का प्रयास किया।
2011 की जनगणना के सामने आए आंकड़ों के मुताबिक 2001 में देश में मुस्लिमों की आबादी में 24 फीसदी की दर से इजाफा हुआ, जबकि राष्ट्रीय औसत महज 18 फीसदी रहा। मीडिया ने मुस्लिम आबादी में इजाफे के लिए अशिक्षा और गरीबीजैसे कारकों को जिम्मेदार ठहराया है। जबकि हिंदू आबादी पढ़-लिखकर लगातार सिमटती गई। लेकिन, शायद यह अधूरा सच है। जो पूरी तरह सामने आना अभी बाकी है।
मुस्लिमों में अधिक बच्चे पैदा करने के प्रचलन को अकसर गरीबी और अशिक्षा से जोड़ने वाले मीडिया को कुछ राष्ट्रीय व अंतर्राष्ट्रीय तथ्यों को ध्यान में रखना चाहिए। अभी हाल ही में दिवंगत हुए सऊदी अरब के शाह अब्दुल्ला बिन सऊद के 50 बच्चे हैं, यह बताने की जरूरत नहीं कि वह शिक्षित थे और पैसों के मामले में उन जैसा कौन! दूसरा उदाहरण खूंखार आतंकी ओसामा बिन लादेन का है, जो एक इंजीनियर था और समृद्ध भी, लेकिन उसकी भी करीब 50 संतानें थीं। पिछले दिनों मुंबई के कल्याण से आतंकी संगठन आईएस में शामिल होने गए इंजीनियर युवक आरिब मजीद के पांच-भाई बहन हैं, उसका परिवार आर्थिक तौर पर खासा सक्षम है और शिक्षित भी। साफ है कि अधिक बच्चे पैदा करने का कारण आर्थिक या अशिक्षित होना नहीं, बल्कि मुस्लिमों की संतानोत्पत्ति के मामले में धर्म का हस्तक्षेप होना है।जिसके चलते तमाम जागरूकता अभियान और अपीलें बेअसर साबित हुई।
पिछले कुछ सालों में देश की बढ़ती आबादी श्रम शक्ति में सकारात्मक इजाफे और देश के बाजार में वृद्धि मानने की धारणा विकसित हुई है। लेकिन इसकी भी एक हद है। जब यह हद पूरी होगी तो श्रम शक्ति बोझ सरीखी हो जाएगी और बाजार गरीब आबादी में तब्दील। इसलिए निश्चित तौर पर संतानोत्पत्ति जैसे निजी मामले में भी सीमित सरकारी दल की जरूरत मालूम पड़ती है। सरकार की ओर से परिवार नियोजन को लेकर कुछ प्रावधान तय किए जाने ही चाहिए, जो सभी धर्मों पर समान रूप से लागू हो। समान नागरिक संहिता लागू कर इसकी कवायद शुरू की जानी चाहिए और मीडिया को इसके लिए जनमत तैयार करने का प्रयास करना होगा। हम दो, हमारे दो का नारा यदि देश के सभी वर्गों में समान रूप गूंजे तो शायद आबादी में नियं़त्रण होगा और हिंदू-मुस्लिम आबादी के घटते-बढ़ते प्रतिनिधित्व जैसी जटिल समस्याएं भी हल हो सकेंगी। बशर्ते मीडिया ईमानदारी से जनमत निर्माण का प्रयास करे।

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