Rahul Gandhi meets street vendors

ऐसा लगता है, लगातार हो रही चुनावी पराजयों ने कांग्रेस को मतिभ्रम का शिकार बना दिया है। वह यही तय नहीं कर पा रही है कि किस राह पर आगे बढ़ना है। अपनी ′हिंदू विरोधी छवि′ को लेकर कांग्रेस नेतृत्व की चिंता यही दर्शाती है। पिछले दिनों खबरें आई थीं कि कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने पार्टी की छवि बदलने के लिए कार्यकर्ताओं से राय लेने की पहल की है। वह यह जानना चाहते हैं कि पार्टी की छवि ′हिंदू विरोधी′ क्यों बनती जा रही है। अगर इन खबरों में जरा भी सच्चाई है, तो मानना होगा कि कांग्रेस एक और गलती करने जा रही है। भारतीय राजनीति में कांग्रेस की पहचान एक ऐसे दल के तौर पर रही है, जिसने तमाम तरह के समझौतों और सियासी तिकड़मों के बावजूद धर्मनिरपेक्षता के मूल्य को बचाए रखने की कोशिश की है। मौजूदा परिदृश्य में कांग्रेस नेतृत्व भले ही धर्मनिरपेक्षता को एक कमजोरी माने, पर हकीकत यह है कि यही उसकी सबसे बड़ी ताकत है।

कांग्रेस की विरासत नेहरू की वह राजनीति है, जिसमें आधुनिकता, विकास और धर्मनिरपेक्षता के तत्व थे। यह किसी धर्म के लिए बाधक नहीं थे और न ही समर्थक। उनकी विचारधारा का एकमेव लक्ष्य देश का सर्वांगीण विकास था। इन्हीं मूल्यों के चलते हिंदू अथवा मुस्लिमों की उपेक्षा या उनको वोटबैंक के तौर पर इस्तेमाल करने के तमाम आरोपों के बावजूद कांग्रेस को लोगों का विश्वास लगातार हासिल हुआ। उसके इस धर्मनिरपेक्ष चरित्र की वजह से ही तमाम विरोधी दल भी सांप्रदायिकता के खिलाफ उसकी छतरी के नीचे ही एकजुट होते रहे। कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी और वरिष्ठ नेताओं को यह ध्यान देना चाहिए कि पार्टी की सबसे बड़ी पराजय ‘हिंदू विरोधी छवि‘ की वजह से नहीं हुई, बल्कि भ्रष्टाचार और अकर्मण्यता से सरकार चलाने के चलते हुई। उस वक्त जब अन्ना आंदोलन अपने चरम पर था, तब लोग कांग्रेस के हिंदू विरोधी रवैये के खिलाफ सड़कों पर नहीं उतरे थे, बल्कि भ्रष्टाचार के मुद्दे ने उसकी चूलें हिला दीं।

इसके अलावा पार्टी के बड़े नेताओं का जनता से कट जाना और राज्यों के स्तर पर नेतृत्व का घोर अभाव पार्टी को ले डूबा। यहां तक कि आंध्र प्रदेश जैसे राज्य में जहां उसका एकछत्र और लोकप्रिय राज था, वहां भी उसे मुंह की खानी पड़ी और पूरा संगठन ही ध्वस्त हो गया। कांग्रेस को अब अपनी खोई साख वापस पाने के लिए लोकसभा में नेता विपक्ष आदि पदों के लिए मनुहार के रवैये को छोड़कर जनहित के मुद्दों पर सड़कों पर उतरकर संघर्ष करना होगा। आखिर भाजपा ने भी सत्ता हासिल करने के लिए अपने विचारों पर डटे रहकर लंबे समय तक संघर्ष किया है। तो फिर कांग्रेस को सत्ता हासिल करने की इतनी जल्दी क्यों है ? फिर यदि कांग्रेस हिंदुत्व के चोले को ओढ़ भी लेती है तो तो भी वह भाजपा को चुनौती देने की स्थिति में नहीं आ पाएगी। जब एक भाजपा पहले से ही मौजूद है तो ‘दूसरी भाजपा‘ की गुंजाइश कहां बनती है ? एक विपक्षी दल के नाते उसे अपने मूल्यों पर डटे रहकर ही जनता के लिए संघर्ष करना चाहिए। कहीं ऐसा न हो कि नई रणनीति अपनाने के चक्कर में उसे माया मिले न राम।

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