kedarnath

खुश होकर देखते हो क्या मेरी तबाही को, कोई सुहानी शाम का मंजर नहीं हूं मैं। यह पंक्तियां उत्तराखंड के हालात और उस पर जारी सियासत की वस्तुस्थिति को बयां करने के लिए सटीक हैं। बीते 15 जून को उत्तराखंड में आसमान से बरसी आफत ने जहां पहाड़ के लोगों पर मुसीबतों का पहाड़ तोड़ दिया, वहीं सियासत इस मौके पर भी अपनी बयानबाजी की रवायत से बाज नहीं आई। जबकि राहत कार्यों और आपदा के मूल कारणों की पड़ताल करने की जहमत किसी ने नहीं उठाई। उत्तराखंड में आई इस तबाही की इबारत विकास के नाम पर कई वर्षों से लिखी जा रही थी। जिसमें सरकार, बिल्डर एवं प्रशासनिक अधिकारियों की मुख्य भूमिका रही है। सन् 2000 में उत्तर प्रदेश से अलग होने के बाद से ही उत्तराखंड को विकास पथ पर ले जाने के नाम पर विनाश के पथ पर अग्रसर करने का काम भाजपा और कांग्रेस की सरकारों ने बारी-बारी से किया। सन् 2008 में लोहारी नागपाला परियोजना के विरोध में और गंगोत्री से लेकर उत्तरकाशी तक 125 किलोमीटर क्षेत्र में गंगा की अविरल धारा के लिए प्रो. जीडी अग्रवाल ने 17 दिनों का आमरण अनशन किया था। इस अनशन के दबाव में आकर उस वक्त केंद्र सरकार ने इस परियोजना को ठंडे बस्ते में डाल दिया था।

हालांकि प्रदेश में भाजपा और उत्तराखंड क्रांति दल ने केंद्र सरकार के निर्णय को गलत करार दिया था। आज यही क्षेत्र प्रमुख रूप से आपदा का शिकार है। सन् 2011 में एक बार फिर प्रो. अग्रवाल ने गंगा की धारा को रोककर बनाए जा रहे बांधों का विरोध करने के लिए अनशन शुरू किया था, लेकिन दुर्भाग्यपूर्ण है कि सरकार के अलावा समाज के भी एक वर्ग ने उनके अनशन का विरोध किया था। सच यह है कि प्राकृतिक संसाधनों की खुली लूट के नाम पर हो रहे विकास को ही समाज ने विकास के रूप में स्वीकार किया है। इसका कारण यह भी है कि आज तक नीति-निर्माताओं ने पर्यावरण मित्र विकास की रूपरेखा बनाई ही नहीं है। उस पर आगे बढ़ना तो अलग बात है। सन् 2011 में ही गंगा की अविरल धारा के लिए 68 दिनों तक लगातार अनशन पर रहने के बाद स्वामी निगमानंद ने गंगा रक्षा के नाम पर अपने प्राणों की आहुति दे दी थी। उनकी मौत पर कुछ दिनों की सियासती बयानबाजी और गंगा के लिए मुहिम के आश्वासनों के साथ उनका तर्पण कर दिया गया। लेकिन हमें जरूरत विकास के उस माडल को तिलांजतिल देने की है, जिसने विकास के नाम पर विनाश की पटकथा तैयार करने का काम किया है।

उत्तराखंड, झारखंड, छत्तीसगढ़ समेत सभी छोटे राज्यों की सरकारों ने तेजी से विकास करने के नाम पर माफियाओं के हाथों को मजबूत करने का काम किया है। ऐसा विकास जिसने प्रदेश के ही लोगों को वहां मजदूरी मात्र उपलब्ध कराई है और संबंधित खनन, जलविद्युत परियोजनाओं, भवन निर्माण आदि से सरकारों तथा खनन एवं निर्माण माफियाओं ने अपनी जेबें भरने का काम किया है। हालांकि मैदानी इलाकों में अवैध खनन और पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने वाले प्रभावों का पता काफी देर से लगता है, लेकिन हिमालयी क्षेत्र काफी संवेदनशील है। तेजी से पिघल रहे ग्लेशियर और दरकते पहाड़ प्रकृति से छेड़छाड़ की हमारी कारगुजारियों का संकेत हमें देते रहे हैं, लेकिन हम विनाश रूपी तथाकथित विकास के पीछे इस कद्र दौड़ रहे हैं कि हमने प्रकृति के संकेतों की आहट को ही अनसुना कर दिया। समस्या यह भी है कि औद्योगिक विकास को ही हमने विकास की अंतिम परिणति मानकर विकास का प्रारूप तैयार किया है या फिर प्राकृतिक संसाधनों के लिहाज से समृद्ध क्षेत्रों में खनन परियोजनाओं को ही विकास का परिचायक मान लिया है।

विकास के विनाशकारी माडल को थोपने में मीडिया की भी कम भूमिका नहीं रही है। गंगा पर चल रही बांध परियोजनाओं के विरोध में चले आंदोलनों को मीडिया ने धार्मिक रंग देने का प्रयास किया। जिसके कारण पर्यावरण की रक्षा के लिए चल रहे आंदोलन की छवि साधुओं के नेतृत्व में चल रहे ऐसे अभियान की बन गई।  जिसके तहत संत समाज आचमन और शुद्ध जल में स्नान की मांग कर रहा है। मीडिया ने गंगा की अविरल और प्रदूषण मुक्त धारा के लिए चल रहे आंदोलनों को जहां संघ परिवार और संत समाज का आंदोलन करार देने का काम किया। वहीं पहाड़ों पर विनाश की इबारत लिखने का विरोध करने वालों को आईएसआई का एजेंट और विदेशी मदद से चलने वाला एनजीओं करार देने का काम किया।

पर्यावरण की रक्षा के बहाने  मानव के अस्तित्व को बचाने की लड़ाई लड़ रहे निगमानंद और प्रो. अग्रवाल के आंदोलनों को मीडिया ने विकास विरोधी और धार्मिक आंदोलन करार देने में देर नहीं की। सन् 2008 में ही जब प्रो. अग्रवाल ने बांध परियोजनाओ का विरोध किया था, तब हम सचेत हो जाते तो शायद आज यह तबाही का मंजर नहीं देखना पड़ता। सरकार को इस आपदा से निपटने के लिए केवल राहत सामग्री के ट्रकों को हरी झंडी दिखाकर ही अपने कर्तव्य की इतिश्री नहीं समझना चाहिए, बल्कि आपदा प्रबंधन को मजबूत करने के अलावा विकास के विनाशकारी प्रारूप के बारे में भी पुनर्विचार करना चाहिए। पहाड़ पर दुखों का पहाड़ न टूटे, इसके लिए हमें उत्तराखंड की तबाही से सबक सीख लेना चाहिए।

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