p.m on twitter
सोशल मीडिया बीते कुछ वर्षों में सामाजिक, राजनीतिक एवं अन्य प्रमुख विषयों पर सोशल नेटवर्किंग के निर्माण और उसके माध्यम से जनमत तैयार करने के माध्यम के रूप में उभरा है। तहरीर चैक और न्यूयार्क के वाल स्ट्रीट घेरो आंदोलन से लेकर दिल्ली के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलनों एवं दामिनी गैंगरेप के खिलाफ आंदोलनों को स्फूर्त करने में सोशल मीडिया की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। यह सोशल मीडिया उन मध्यम एवं आभासी मध्यमवर्ग के युवाओं के लिए क्रांति का हथियार बना है, जो मनमोहन सिंह की उदारीकरण की नीतियों के लागू होने के बाद जन्मा है। उदारीकरण के दौर में जन्मी पीढ़ी ने देश में उपभोक्तावादी व्यवस्था के तहत निजी क्षे़त्रों से सेवाएं ली हैं और उसे वाजिब कीमत दी है। इस उपभोक्तावादी दौर में लोगों को कंज्यूमर केयर मिला है, जो अपनी सेवाओं में आने वाली किसी भी समस्या के लिए 24 घंटे समाधान देने को तत्पर रहता है। आज का युवा सरकारी व्यवस्था से भी वाजिब कीमत पर सेवाएं चाहता है और सेवाओं में कमी के लिए 24 घंटे समाधान करने को तत्पर रहने वाला सरकारी कंज्यूमर केयर सेंटर भी चाहता है। दुर्भाग्य से मनमोहन के उदार अर्थशास्त्र ने युवाओं को उपभोक्तावादी संस्कृति का आदी तो बनाया है, लेकिन सरकारिया दृष्टिकोण से देश की जनता को उस तरह की सेवाएं नहीं दे पाया है।

स्क्रीन टच का आदी युवा वर्ग सेवाओं में किसी प्रकार की देरी को स्वीकार्य नहीं करता। यही कारण है कि सुरक्षा से लेकर भ्रष्टाचार तक किसी भी मामले पर देश का युवा सड़कों पर उतरकर प्रदर्शन करता है, शायद देश का युवा कंज्यूमर केयर सेंटर की कमी को लेकर ही आंदोलन का रूख अख्तियार कर रहा है। बदलते भारत की पहली तस्वीर यही है, जो किसी भी बातूनी आश्वासन के बजाय कार्रवाई होते देखना चाहती है। दुर्भाग्य से जहां युवाओं ने सोशल मीडिया को सामाजिक, राजनीतिक जागरूकता के लिए इस्तेमाल किया है, वहीं देश की व्यवस्था ने उन्हें कोरे आाश्वसन देने के लिए ट्वीट करने की कार्रवाई शुरू की है। प्रायः पिछली कुछ घटनाओं में देखा गया है कि जहां देश आक्रोशित हो सड़क पर उतर आया, वहीं सत्ता ने लोगों को ट्वीटिया कार्रवाई कर दिलासा दी। अल्पभाषी प्रधानमंत्री ने भी शायद न बोलने का विकल्प तलाशते हुए ट्वीटर पर ही अपनी चिंताएं जाहिर करनी शुरू कर दी हैं। देश में घटित किसी बड़ी घटना पर ट्वीट कर नेताओं ने अपने कर्तव्यों की इतिश्री करने का काम किया है। यह भी उल्लेखनीय है कि नेताओं के ट्वीटर अकाउंट भी उनकी सलाहकार मंडली ही चलाती है। ऐसे में किसी भी घटना पर कार्रवाई करने के बजाय ट्वीट करने से किसी भी समसया का हल नहीं हो सकता।

‘‘हम भ्रष्टाचार मिटाने के लिए प्रतिबद्ध हैं‘‘, ‘‘हमें देश के युवाओं की अपेक्षाएं पूरी करनी होंगी‘‘ इस तरह के कुछ ट्वीट पिछले दिनों राजनीतिक व्यवस्था के शीर्ष पर बैठे लोगों की ओर से हुए थे। साफ है कि यह ट्वीट लोगों के सब्र की परीक्षा लेने वाले ही थे। जब देश का नागरिक किसी मामले पर अपने खेवनहारों की राय जानना, सुनना चाहता है। तब उनकी अस्मिता, सुरक्षा और आजीविका के जिम्मेदार लोगों की टवीटवाणी ही सुनने को मिलती है। अब तो मीडिया भी इन टवीटिया आश्वासनों को ब्रेकिंग न्यूज बनाने लगा है। अब जाएं तो जाएं कहां। मौन सत्ता का मौन अब ट्वीटर पर ही टूटता है। तब तक तो ठीक था, जब तक युवा अपने नेटवर्क के विस्तार और विचारों के अदान-प्रदान के लिए सोशल मीडिया का उपयोग करते थे। लेकिन अब तो व्यवस्था ही सोशल मीडिया पर आ गई है, तो हम कहां जाएं। निश्चित तौर पर जनाक्रोश को ट्वीट के माध्यम से ज्यादा दिन बहलाया नहीं जा सकता। अब हमारे कर्णधारों को वह निर्णय लेने ही होंगे जो देश के नागरिकों को सरकारी कंज्यूमर केयर सेंटर सरीखे लगें। सड़कों पर जनाक्रोश हो और व्यवस्था ट्वीट कर के दिलासा दे, इससे देश नहीं चल सकता।

 

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