क्रांति, आंदोलन एवं किसी अभियान की सफलता में पत्रकारिता का महत्वपूर्ण योगदान रहता है। विचारधाराओं के प्रसारण एवं उसके स्थापन में भी पत्रकारिता की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। भारतीय पत्रकारिता के संदर्भ में यह और भी अधिक दावे से कहा जा सकता है कि पत्रकारिता ने राष्ट्रवादी विचारों के प्रसार एवं जनमत निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की है। भारत में पत्रकारिता ने अपने उद्भव के साथ ही राष्ट्र के पुनर्जागरण में अपनी भूमिका का निर्वहन करना प्रारंभ कर दिया था। विभिन्न क्रांतिकारियों ने भी पत्रकारिता के माध्यम से लोगों को स्वदेशी, स्वराज्य एवं स्वाधीनता के विचारों को जनसामान्य तक पहुंचाने का कार्य किया। जिनमें लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक प्रमुख व्यक्ति थे।
लोकमान्य तिलक का जन्म 23 जुलाई, 1856 को महाराष्ट्र के रत्नागिरी में हुआ था। वह भारत की उस पीढ़ी के व्यक्ति थे जिन्होंने आधुनिक कालेज की शिक्षा पाई। संस्कृत के प्रकांड पंडित, देशभक्त एवं जन्मजात योद्धा तिलक भारत में स्वदेशी, स्वराज्य एवं स्वसंस्कृति को पुनः स्थापित करने के लिए आजीवन प्रयासरत रहे। सन 1885 में अंग्रेज अधिकारी हयूम के नेतृत्व में स्थापित कांग्रेस नागरिक सुविधाओं के लिए प्रस्ताव पारित करने और अनुनय-विनय करने तक ही सीमित थी। जिसे लोकमान्य तिलक ने सन 1905 के बाद से राष्ट्रवादी स्वरूप प्रदान किया और ‘‘स्वराज्य मेरा जन्म सिद्ध अधिकार है और हम इसे प्राप्त करके रहेंगे‘‘ का नारा दिया। जिसके बाद कांग्रेस दो दलों में विभाजित हो गई नरम दल एवं गरम दल।
सन 1905 में ब्रिटिश शासन की बंग विभाजन की योजना ने तत्कालीन कांग्रेस में भूचाल ला दिया था। कांग्रेस को अनुनय-विनय की नीति से निकालकर तिलक ने इसे प्रखर राष्ट्रवादी स्वरूप दिया था। इसमें उनके पत्रों ‘मराठा‘ एवं ‘केसरी‘ की महत्वपूर्ण भूमिका थी। ‘निबंध माला‘ पत्रिका के संपादक विष्णु कृष्ण चिपलूणकर एवं गोपालकृष्ण आगरकर के सहयोग से तिलक ने 1880 को न्यू इंग्लिश स्कूल की स्थापना की थी। जो बाद में डेकन एजुकेशन सोसायटी के रूप में विकसित हुआ। इसके साथ ही ‘मराठा‘ और ‘केसरी‘ का प्रकाशन भी प्रारंभ हुआ। इन पत्रों को छापने के लिए एक प्रेस खरीदा गया, जिसका नाम ‘आर्य भूषण प्रेस‘ रखा गया। तिलक, आगरकर और चिपलूणकर अपनी संस्थाओं के लिए शारीरिक श्रम से भी नहीं हिचकते थे। प्रेस के टाइप, केसों आदि को ढोकर नये स्थान पर खुद ले गए थे और स्कूल खुलने के समय वे इमारत को स्वयं झाड़ते और साफ करते थे। जब ‘मराठा’ और ‘केसरी’ निकलना शुरू हुए, तो वे समाचार पत्र की प्रतियों को स्वयं ही लोगों तक पहुंचाते थे.
‘केसरी’ के प्रकाशन के बाद उन्होंने उसके स्वरूप एवं पत्रकारिता के अपने उद्देश्य को स्पष्ट करते हुए लिखा था-

‘‘केसरी निर्भयता एवं निष्पक्षता से सभी प्रश्नों की चर्चा करेगा। ब्रिटिश शासन की चापलूसी करने की जो प्रवृत्ति आज दिखाई देती है,वह राष्ट्रहित में नहीं है। ‘केसरी‘ के लेख इसके नाम को सार्थक करने वाले होंगे।”

कांग्रेस में नरम दल और गरम दल के आधार पर विभाजन होने के पश्चात तिलक के पत्रों ने गरम दल की विचारधारा को स्थापित करने में मदद की थी। स्वदेशी एवं स्वराज्य के विचारों को तिलक ने अपने पत्र ‘मराठा और ‘केसरी के माध्यम से ही प्रतिपादित किया था। लोकमान्य चार सूत्री कार्यक्रम बहिष्कार, स्वदेशी, राष्ट्रीय शिक्षा और स्वराज आंदोलन के माध्यम से देश को जागृत करने का कार्य कर रहे थे। भारतवासियों को बहिष्कार आंदोलन का मर्म समझाते हुए तिलक ने ‘केसरी‘ के संपादकीय लिखा था-
‘‘लगता है कि बहुत से लोगों ने बहिष्कार आंदोलन के महत्व को समझा नहीं। ऐसा आंदोलन आवश्यक है, विशेषकर उस समय जब एक राष्ट्र और उसके विदेशी शासकों में संघर्ष चल रहा हो। इंग्लैंड का इतिहास इस बात का ज्वलंत उदाहरण प्रस्तुत करता है करता है कि वहां की जनता अपने सम्राट का कैसे नाकों चने चबवाने के लिए उठ खड़ी हुई थी, क्योंकि सम्राट ने उनकी मांगे पूरी करने से इंकार कर दिया था। सरकार के विरूद्ध हथियार उठाने की न हमारी शक्ति है न कोई इरादा है। लेकिन देश से जो करोड़ों रूपयों का निकास हो रहा है क्या हम उसे बंद करने का प्रयास न करें। क्या हम नहीं देख रहे हैं कि चीन ने अमेरिकी माल का जो बहिष्कार किया था, उससे अमेरिकी सरकार की आंखें खुल गईं। इतिहास ऐसे उदाहरणों से भरा पड़ा है कि एक परतंत्र राष्ट्र, चाहे वह कितना ही लाचार हो, एकता साहस और दृढ़ निश्चय के बल पर बिना हथियारों के ही अपने अंहकारी शासकों को धूल चटा सकता है। इसलिए हमें विश्वास है कि वर्तमान संकट में देष के दूसरे भागों की जनता बंगालियों की सहायता में कुछ भी कसर उठा न रखेगी।‘‘ (तिलक से आज तक,हंसराज रहबर)
लोकमान्य तिलक ऐसे क्रांतिकारी थे, जिन्होंने न केवल आंदोलन चलाए बल्कि,आंदोलनों को पत्रों के माध्यम से वैचारिक आधार भी प्रदान किया। ‘मराठा‘ और‘केसरी‘ के माध्यम से उन्होंने गणेश उत्सव, शिवाजी उत्सव एवं स्वदेशी के उपयोग में लोगों से भागीदार बनने की अपील की। लोकमान्य जो आंदोलन चलाते उसका उनके पत्र बखूबी आह्वान करते थे। तिलक ने ही स्वदेशी के उपयोग एवं ब्रिटिश वस्तुओं के बहिष्कार का आह्वान किया था। जिसका अनुसरण आगे चलकर महात्मा गांधी ने भी किया था। तिलक ने स्वदेशी और बहिष्कार आंदालन के राजनीतिक महत्व को उजागर किया। उन्होंने लोगों से कहा कि चाहे कुछ भी त्याग करना पड़े, वे स्वदेशी का उपभोग करें। अगर कोई भारतीय वस्तु उपलब्ध न हो तो उसके स्थान पर गैरब्रिटिश वस्तु इस्तेमाल में लाएं। उन्होंने लिखा-

‘‘ब्रिटिश सरकार चूंकि भारत में भय से मुक्त है, इससे उसका सिर फिर गया है और वह जनमत की नितान्त उपेक्षा करती है। वर्तमान आंदालन से जो एक सार्वजनिक मानसिकता उत्पन्न हो गई है, उससे लाभ उठाकर हमें एक ऐसे केन्द्रीय ब्यूरो का संगठन करना चाहिए जो स्वदेशी माल और गैरब्रिटिश माल के बारे में जानकारी एकत्रित करे। इस ब्यूरो की शाखाएं देश भर में खोली जाएं, भाषण और मीटिंगों द्वारा आंदोलन के उद्देश्य की व्याख्या की जाये और नई दस्तकारियां भी लगाई जाएं।‘‘

लोकमान्य तिलक ने जिस सोसायटी की स्थापना अपने मित्रों के साथ मिलकर की थी, सैद्धांतिक अतंर्विरोधों के कारण उन्होंने उस सोसायटी से 14 अक्टूबर, 1890 को इस्तीफा दे दिया। उन्होंने मराठा और केसरी को भी सोसायटी से अलग कर लिया। इन पत्रों पर उस वक्त 7,000 का ऋण था, उसे चुकाने की जिम्मेदारी भी उन्होंने स्वयं पर ली। सोसायटी से अलग होने के पश्चात लोकमान्य ने स्वयं को पूरी तरह जनकार्य में ही झोंक दिया। लोकमान्य तिलक के जीवनीकार टी.वी पर्वते ने उनके ‘मराठा और ‘केसरी‘ पत्रों के लिए समर्पण के बारे में लिखा है कि-

‘‘1891 से ‘केसरी‘ और ‘मराठा‘ तिलक की ही मिलकियत बन गए थे। कई साल तक उनमें घाटा होता रहा, लेकिन इन पत्रों ने उनके जीवनक्रम को बहुत ही प्रभावित किया। जनता की हर शिकायत और हर समस्या पर प्रति सप्ताह लिखते रहने से वे जनससमयाओं के जननेता और प्रवक्ता बन गए।‘‘

लोकमान्य तिलक ने ‘केसरी एवं ‘मराठा‘ को सुचारू रूप से चलाने के लिए अपना बहुत कुछ दांव पर लगाया था। उनके यह पत्र चूंकि घाटे का सौदा थे,इसलिए अपनी जीविका के लिए उन्होंने अपने कानून के ज्ञान का सहारा लिया। वकालत से उन्हें दो सौ रूपये मासिक की आय हो जाती थी, जिससे उनके परिवार का खर्च आसानी से चल जाता था। पत्रों को उन्होंने कभी भी लाभ का धंधा नहीं बनाया।
लोकमान्य तिलक के लेख क्रांतिकारियों के लिए प्रेरणास्रोत के समान थे। उनका लेखन एवं मार्गदर्शन क्रांतिकारियों को ऊर्जा प्रदान करता था। यही कारण था कि तिलक के पत्र ‘मराठा और ‘केसरी‘ ब्रिटिश सरकार को बिल्कुल न सुहाते थे। लोकमान्य भारत के उन प्रमुख क्रांतिकारियों में से थे जिन्हें अपने लेखों के कारण जेलयात्राएं भी करनी पड़ीं। किंतु, वे सदैव अपने पत्रकारीय धर्म पर अडिग रहे। इसका एक उदाहरण है-

सन 1902 में पुणे प्लेग फैला था। अनेकों लोग भयवश स्थानांतरित हो गए। ‘केसरी जहां छपता था, एक दिन उस आर्यभूषण मुद्रणालय के स्वामी ने लोकमान्य को अपनी अड़चन बताई, ‘‘मुद्रणालय में कीलें जोड़नेवाले कर्मचारियों की अनुपस्थिति बढ़ रही है, जिससे प्लेग के न्यून होने तक ‘केसरी‘ की प्रति समय पर निकलेगी कि नहीं कह नहीं सकते।‘‘

तिलक कड़े स्वर में बोले, ‘‘आप आर्यभूषण के स्वामी और मैं केसरी का संपादक, यदि इस महामारी में हम दोनों को ही मृत्यु आ गई, तब भी अपनी मृत्यु के पश्चात पहले 13 दिनों में भी ‘केसरी‘ मंगलवार की डाक से जाना चाहिए।‘‘ (दैनिक सनातन प्रभात)

लोकमान्य तिलक क्रांतिधर्मी पत्रकार थे। जिन्होंने पत्रकारिता और स्वाधीनता तथा स्वदेशी के आंदोलन को एक-दूसरे के पूरक के रूप में विकसित किया था।लोकमान्य तिलक पत्रकारिता जगत के लिए प्रेरणापुंज हैं, जिन्होंने पत्रकारिताको अपने उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए मुखरता प्रदान की। 1 अगस्त, 1920 कोलोकमान्य तिलक का अचानक देहांत हो गया। किंतु, उन्होंने पत्रकारिता जगत में समर्पण भाव से कार्य करने का जो मापदंड स्थापित किया था, वह आज भी प्रासंगिक है।

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