हिंदी भाषा के विकास के साथ ही हिंदी पत्रकारिता का भी विकास हुआ है। कह सकते हैं कि हिंदी भाषा को परिष्कृत करने और आम लोगों तक पहुंचाने में हिंदी पत्रकारिता की भी महत्वपूर्ण भूमिका रही है। हिंदी भाषा ने राष्ट्रीय एकता को मजबूत करने में महत्वपूर्ण योगदान दिया है एवं उसके वाहक बने हैं हिंदी के समाचार पत्र

हिंदी के प्रथम समाचार पत्र ‘उदन्त मार्तण्ड‘ की शुरुआत भारत की भाषा में भारत के हितों की बात करने के लिए हुई थी। ‘उदन्त मार्तण्ड‘ के इस उद्देश्य को आगे आने वाले समाचार पत्रों ने भी पूर्ण करने का प्रयास किया। हिंदी पत्रकारिता की शुरुआत 19वीं शताब्दी में हुई थी जब देश परतंत्र था। यही कारण था की भारत को स्वराज्य दिलाना एवं मातृभूमि के गौरव को पुनः हासिल करना ही हिंदी पत्रकारिता का उद्देश्य था।

हिंदी पत्रकारिता को क्रांति एवं राष्ट्रहित के मार्ग पर ले जाने के लिए अनेकों पत्रकारों ने अहोरात्र संघर्ष किया। ऐसे ही पत्रकार थे, पं. दुर्गाप्रसाद मिश्र। 19वीं सदी की हिंदी पत्रकारिता में दुर्गाप्रसाद मिश्र का महत्वपूर्ण योगदान माना जाता है। दुर्गाप्रसाद मिश्र का जन्म 31 अक्टूबर, 1860 को जम्मू-कश्मीर के सांवा नगर में हुआ था। उन्होंने काशी में संस्कृत एवं कलकत्ता के नार्मल स्कूल से अंग्रेजी शिक्षा प्राप्त की।

दुर्गाप्रसाद ने कलकत्ता को ही अपनी कर्मभूमि बनाया। उन्होंने अपनी पत्रकारिता की शुरुआत काशी से निकलने वाली साहित्यिक पत्रिका ‘कविवचनसुधा‘ के संवाददाता के रूप में की। इसके पश्चात वे 17 मई 1878 को कलकत्ता से प्रकाशित होने वाले ‘भारत-मित्र‘ से जुड़े जिसका संपादन पं. छोटूलाल मिश्र करते थे। ‘भारत-मिश्र‘ के प्रबंध संपादक की जिम्मेदारी पं. दुर्गाप्रसाद मिश्र के पास ही थी। लगभग एक वर्ष के पश्चात वे ‘भारत-मित्र‘ से अलग हो गए, कितु उनकी पत्रकार जीवन की यात्रा के कई पड़ाव अभी बाकी ही थे। 13 अप्रैल, 1879 को उन्होंने पं. सदानंद मिश्र के सहयोग से ‘सारसुधानिधि‘ निकाला। यह पत्र उन्नीसवीं सदी के अत्यंत ओजस्वी पत्रों में से एक था। राष्ट्र में स्वराज्य की वापसी एवं समाज का पुनर्जागरण ही ‘सारसुधानिधि‘ का मूल स्वर था। ‘सारसुधानिधि‘ के संपादक संदानंद मिश्र की यह संपादकीय टिप्पणी पत्र के उद्देश्य को बताने के लिए पर्याप्त जान पड़ती है-

 ‘‘भारत के दुर्भाग्य को अपना दुर्भाग्य और भारत के सौभाग्य को अपना सौभाग्य समझो। नही तो भारत का दुर्भाग्य कदापि दूर नहीं होगा। (सारसुधानिधि, वर्ष 2, अंक 25)

‘सारसुधानिधि‘ में सक्रिय सहयोग देने के पश्चात सन 1880 में पं. दुर्गाप्रसाद मिश्र ने अपने स्वयं के पत्र ‘उचित वक्ता‘ का प्रकाशन प्रारंभ किया। यह पत्र अपने नाम के अनुरूप उचित विषय ही उठाता था। श्री मिश्र ने इस पत्र के माध्यम से जनचेतना को जाग्रत करने का बीड़ा उठाया था। ब्रिटेन की छत्रछाया में भारत की कथित प्रगति को उजागर करते हुए उन्होंने भारतीयों को दासता से मुक्त होने के लिए प्रेरित किया। उन्होंने अपनी संपादकीय टिप्पणी में लिखा-

‘‘पहली उन्नति और अबकी उन्नति में अंतर इतना ही है कि वह स्वाधीन भारत की उन्नति थी। उस उन्नति में उन्नतिमना स्वाधीनता प्रिय भारत संतानों का गौरव था और यह पराधीन भारत की उन्नति हो रही है। इस उन्नति में पदावनत हम भारत कुल तिलकों की अगौरव के सहित गर्दन नीची होती जाती है‘‘

पत्रकार का कर्तव्य सत्य के लिए असत्य से लड़ना ही होता है। बशर्ते, उसके लिए उसे कोई कीमत ही क्यों न चुकानी पड़े। सरकारों ने समय-समय पर पत्रकारिता पर शिकंजा कसते हुए जनसरोकार से जुड़े मुददे अथवा आंदोलनों को दबाने का प्रयास किया है। चाहे वह अंग्रेजी सरकार रही हो अथवा स्वतंत्र भारत में आपातकाल का दौर। पं. दुर्गाप्रसाद मिश्र ऐसे ही पत्रकारों में से थे जो हर वक्त अपने कर्तव्य मार्ग पर डटे रहे। वे डटे ही नहीं बल्कि अंग्रेजी हूकूमत के विरूद्ध लड़े भी। अपने कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का आह्वान करते हुए उन्होंने मई, 1883 के अपने संपादकीय में लिखा-

 ‘‘देशी संपादकों, सावधान। कहीं जेल का नाम सुनकर कर्तव्यविमूढ़ मत हो जाना। यदि धर्म की रक्षा करते हुए, यदि गवर्नमेंट को सत्परामर्श देते हुए जेल जाना पड़े तो क्या चिंता है। इसमें मान हानि नहीं होती है। हाकिमों के जिन अन्यायपूर्ण आचरणों से गवर्नमेंट पर सर्वसाधारण की अश्रद्धा हो सकती है, उसका यथार्थ प्रतिवाद करने जेल में तो क्या, द्वीपांतरित भी होना पड़े तो क्या बड़ी बात है? क्या इस सामान्य विभीषिका से हमलोग अपना कर्तव्य छोड़ बैठें?‘‘

श्री दुर्गाप्रसाद मिश्र भारतीय पत्रकारों के अग्रणी योद्धा थे। उनके तेजस्वी पत्रों ने लोगों में चेतना का संचार किया। यद्यपि दुर्गाप्रसाद जी ने ऐसे समय में पत्रकारिता की थी जब हिंदी का पाठक थी हिंदी की उन्नति के प्रति उदासीन था। ऐसे समय में पत्रकारिता करना एवं सरकारी सहायता के बिना पत्रों को चलाने का जोखिम लेना आसान नहीं था। हिंदी पाठकों की उदासीनता से व्यथित होकर ही ‘सारसुधानिधि‘ के संपादक ने 5 जनवरी, 1880 के अंक में लिखा था-

 ‘‘जैसी अवस्था हिंदी भाषा की है, इस पर ऐसी आशा नहीं होती कि लोग शौक से हिंदी भाषा के अनुरागी होकर हिंदी पत्रों की सहायता की दृष्टि से लिया करें और यथासमय दाम दिया करें कि जिसमें पत्र संपादकों को केवल देशोपकारक की चिंता के दूसरी चिंता न रहे। देशवासियों को समाचार पत्र का प्रयोजन, उसका उद्देश्य और उपयोगिता हृदयंगम नहीं हुई है‘‘

पं. दुर्गा प्रसाद मिश्र की पत्रकारिता में समझौतों के लिए कोई स्थान नहीं था। यही कारण था कि उनकी लेखनी पूर्णतया निष्पक्ष थी। उन्होंने ‘उचित वक्ता‘ के माध्यम से तत्कालीन समय के उचित प्रश्नों को उठाया था। ‘उचित वक्ता‘ में मिश्र जी के लेखन के बारे में पं. अम्बिका प्रसाद वाजपेयी ने कहा था-

 ‘‘यह उनका अपना पत्र था। इसमें किसी का साझा न था। प्रायः दो वर्षों में इन्हें लिखने-पढ़ने और पत्र संपादन करने का अच्छा अनुभव हो गया था, इसलिए ‘उचित वक्ता‘ बड़ा तेजस्वी पत्र हुआ। इसमें लिखने-पढ़ने में कोई मिश्र जी का हाथ पकड़ने वाला न था, इसलिए वे पूर्ण स्वतंत्रता से लिखते थे।‘‘

पत्रकारिता मिशनरी कार्य है, मिशन की तरह जुटना पड़ता है। पं. दुर्गाप्रसाद मिश्र भी पत्रकारिता के कार्य में मिशनरी भाव से ही जुटे रहे। उनका पत्रकार जीवन प्रतिकूल परिस्थितियों से संघर्ष में ही बीता। ‘‘उचित वक्ता‘‘ पत्र को उन्होंने बड़े प्रयासों से चलाया था। जिसकी उन्हें कीमत भी चुकानी पड़ी, किंतु वे कभी निराश नहीं हुए। शायद बाधाएं ही उनकी प्रेरणा थीं। जिस राष्ट्रीय चेतना को जागृत करने के लिए ‘उचित वक्ता‘ का जन्म हुआ था उसे जीवित रखने के लिए पं. दुर्गाप्रसाद मिश्र को अनेक भूमिकाओं में उतरना पड़ता था। पत्र की सामग्री तैयार करने, छापने, ग्राहकों तक पहुचाने एवं उन्हें पढ़कर सुनाने-समझाने तक का कार्य उन्हें स्वयं ही करना पड़ता था।

 ‘उचित वक्ता‘ के संपादन में उनको आर्थिक हानि भी झेलनी पड़ी थी। इस संबंध में पं. अम्बिका प्रसाद वाजपेयी ने लिखा है- ‘‘दुर्गा प्रसाद जी ने घर का धान पुआल में मिलाया।‘‘

अंग्रेजी सरकार की गलत नीतियों की आलोचना एवं भारत का पुनर्जागरण करना ही तत्कालीन समाचार पत्रों का मूल उद्देश्य था। उनका यह प्रयास स्वातंत्र्य देवी के दर्शन के लिए था। भारत आजाद हो और भारत पर स्वकीय जनों का शासन आए यही उस समय के पत्रकारों एवं संपादकों का लक्ष्य था, जिसके लिए उनकी पत्रकारिता सदैव समर्पित रहती थी। यद्यपि पत्रकारों को अपने इस उद्देश्य के लिए विभिन्न यातनाओं एवं कष्टों को झेलना पड़ा था। तत्कालीन समय के संपादकों एवं पत्रकारों के कष्टों के बारे में उचित वक्ता के 23 दिसंबर, 1882 के अंक में दुर्गा प्रसाद मिश्र ने लिखा था-

 ‘‘हम भारतीय पत्र संपादकों की जैसी हीन और मलीन दशा है वह किसी से अविदित नहीं है। ये लोग सदा अपने देश की भलाई के लिए उद्यत रहते हैं उसी से सदैव गवर्नमेण्ट के समीप राजभक्ति विहीन अधम गिने जाते हैं। क्षुद्र हाकिमों से लगाकर उच्चतर चिरपतियों तक का इन पर आक्रोश बना रहता है।‘‘

पत्रकारिता के उद्देश्यों के लिए पं. दुर्गाप्रसाद मिश्र सदैव प्रयत्नशील  रहे। सारसुधानिधि, उचितवक्ता एवं भारतमित्र जैसे अपने समय के प्रतिष्ठित पत्रों में उन्होंने लेखन एवं संपादन किया। उनके पत्रों से लेखक के तौर पर भारतेंदु हरिशचन्द्र एवं दयानन्द सरस्वती जैसी महान विभूतियां भी जुड़ीं। हिंदी पत्रकारिता के अतिरिक्त उन्होंने बंगला के स्वर्णलता के आधार पर सरस्वती नामक नाटक भी लिखा। उन्होंने बिहार प्रांत के विद्यालयों के लिए पाठ्य पुस्तकें भी लिखीं। उनका जीवन शब्दों की आराधना के लिए ही समर्पित था। वे हिंदी के ऐसे पत्रकार रहे हैं जिन्हें हिंदी पत्रकारिता के जन्मदाताओं एवं प्रचारकों में शुमार किया जाता है।

दुर्गाप्रसाद जी का निधन सन 1910 में हुआ। वे हिंदी पत्रकारिता को अपनी अमूल्य प्रेरणा देकर गए। जो आज भी हिंदी के पत्रकारों को हिंदी की सेवा एवं राष्ट्र जागरण के लिए पत्रकारिता करने का मार्गदर्शन देती हैं। दुर्गाप्रसाद मिश्र सरीखे पत्रकार का जीवन परिचय ही पत्रकारिता की वर्तमान पीढ़ी के लिए प्रेरणापुंज के समान है।

 

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