जल ही जीवन है। जीवन को बनाए रखने के लिए अपरिहार्य जल की उपलब्धता निरंतर कम हो रही है। बढ़ती जनसंख्या एवं शहरीकरण के प्रसार ने जल संकट को गहराने का काम किया है। भारत जैसे अधिक आबादी वाले देश के लिए जल संकट बढ़ना खतरे की घंटी है। भारत में विश्व की 17 प्रतिशत आबादी निवास करती है। जबकि विश्व का केवल 4 प्रतिशत नवीकरणीय जल संसाधन भारत में उपलब्ध है। ऐसे में भारत के लिए आने वाला समय जल की उपलब्धता की दृष्टि से चुनौतीपूर्ण रहने वाला है।

भारत में जल समस्या– देश के 604 जिलों में से 246 जिले सूखे की मार झेल रहे हैं। यानि लगभग आधा देश ही सूखे की चपेट में है। जबकि प्रदेश की सरकारें केवल जिलों को सूखाग्रस्त घोषित करने में ही मुस्तैद दिखाई पड़ती हैं। इस कार्रवाई के बाद राहत पैकेज के रूप में सांत्वना राशि का वितरण करके कर्तव्य की इतिश्री करने का काम सरकारों ने किया है। जबकि जल की कम होती उपलब्धता की मूल समस्या के निदान के विषय में सरकारों का रवैया उपेक्षापूर्ण दिखाई देता है। नासा की रिपोर्ट के मुताबिक भारत में जल के अंधाधुंध दोहन के कारण देश के कई राज्यों में जल स्तर तेजी से गिरा है। सन 2002 से 2008 के दौरान किए गए अध्ययन के मुताबिक नासा ने बताया है कि राजस्थान, पंजाब और हरियाणा हर साल औसतन 17.7 अरब क्यूबिक मीटर जल का दोहन कर रहे हैं।

जबकि केन्द्र के अनुमान के मुताबिक इन राज्यों को प्रति वर्ष 13.2 अरब क्यूबिक मीटर पानी ही निकालना चाहिए। अर्थात तीनों राज्य तीस फीसदी अधिक जल का दोहन कर रहे हैं। रिपोर्ट के मुताबिक भारत में भूजल का 58 फीसदी हिस्से का ही नवीनीकरण हो पाता है। स्पष्ट है कि भूजल के अत्यधिक दोहन ने जल की समस्या में इजाफा करने का काम किया है। सूखाग्रस्त क्षेत्र का बढ़ता दायरा एवं उपलब्ध भूजल का प्रदूषित होना भविष्य की भयावह तस्वीर को प्रस्तुत करता है।

देश के विभिन्न हिस्सों का भूजल तेजी से प्रदूषित हो रहा है। जिससे लोगों को प्रदूषित जल ही पीना पड़ रहा है। जहां मीठे जल की उपलब्धता है उन क्षेत्रों में जल का दोहन इतना अधिक है कि जल का स्तर निरंतर गिरावट की ओर है। ऐसे में देश में मीठे एवं स्वच्छ जल को कब्जाने को लेकर अंतर्राष्ट्रीय कंपनियों ने भी अपनी निगाह गड़ा रखी हैं। देश के सभी नागरिकों कें लिए स्वच्छ पेयजल की उपलब्धता एवं सिंचाई के लिए जल की पर्याप्त उपलब्धता सरकार की प्राथमिकता होनी चाहिए। इसके उलट सरकारी प्राथमिकताएं कुछ और ही नजर आती हैं। जिसका उदाहरण है जल संसाधन मंत्रालय द्वारा तैयार जल नीति प्रारूप-2012

जल नीति प्रारूप-2012- जल संसाधन मंत्रालय द्वारा तैयार प्रारूप में जल के उचित प्रबंध एवं संरक्षण हेतु सार्वजनिक-निजी भागीदारी की पैरोकारी की गई है। प्रस्तावित जल नीति के अनुसार जल के संरक्षण, आपूर्ति एवं प्रबंधन हेतु संस्थागत प्रयास किए जाने की आवश्यकता पर बल देते हुए निम्न सुझाव दिए हैं-

– प्रत्येक राज्य में एक जल विनियमन प्राधिकरण की स्थापना की जानी चाहिए। प्राधिकरण अन्य बातों के साथ-साथ इस नीति में उल्लिखित नियमों के अनुसार सामान्यतः स्वायत्त ढंग से जल शुल्क प्रणाली तथा प्रभारों का निर्धारण और विनियमन करना चाहिए। प्राधिकरण को शुल्क प्रणाली के अलावा आवंटन का विनियमन करने, निगरानी प्रचालन करने, निष्पादन की समीक्षा करने तथा नीति में परिवर्तन करने संबंधी सुझाव इत्यादि देने जैसे कार्य भी करने चाहिए। राज्य में जल विनियमन प्राधिकरण को अंतः राज्यीय जल संबंधी विवादों का समाधान करने में भी सहयोग देना चाहिए।

– जल संसाधन की आयोजना, कार्यान्वन और प्रबंधन हेतु जिम्मेदार संस्थानों के सुदृढ़ीकरण हेतु राज्य को ‘सेवा प्रदाता‘ से सेवाओं के विनियामकों और व्यवस्थाधारकों की भूमिका में धीरे-धीरे हस्तांतरित होना चाहिए। जल संबंधी सेवाओं को समुचित ‘‘सार्वजनिक निजी भागीदारी‘‘ के उचित प्रारूप के अनुसार समुदाय तथा/अथवा निजी क्षेत्र को हस्तांतरित किया जाना चाहिए।

– दोनों सतही और भूजल की जल गुणवत्ता की निगरानी के लिए प्रत्येक नदी बेसिन हेतु समुचित संस्थागत व्यवस्था को विकसित किया जाना चाहिए।

जल संसाधन मंत्रालय द्वारा तैयार प्रारूप में जल के वितरण पर शुल्क प्रभार लगाना एवं वितरण, संरक्षण अथवा प्रबंधन को निजी हाथों में सौंपने का मसौदा तैयार किया गया है। जाहिर है प्रकृति के पांच तत्वों जिनके बारे में कहा गया है कि-

  क्षिति जल पावक गगन समीरा,

    पंच रचित अति अधम शरीरा।

प्रकृति की रचना करने वाले पांच तत्वों में महत्वपूर्ण तत्व जल की उपलब्धता ही हमारे जीवन का आधार है। जल ही जीवन है। लेकिन यह जीवन अब हमको बाजार से खरीदना होगा। भारत सरकार द्वारा तैयार जल नीति का प्रारूप यही कहता है। जल की बर्बादी को रोकने और जल संरक्षण के नाम पर तैयार प्रारूप जल के निजीकरण की बात करता है।

भारत में बढ़ती जनसंख्या एवं बढ़ते शहरीकरण ने कई क्षेत्रों में पानी की किल्लत पैदा कर दी है। जल की बढ़ती आवश्यकता एवं भूजल के अत्यधिक दोहन के कारण भूजल की गहराई बढ़ गई है। कई क्षेत्रों में तो आम नलों से पानी निकलना दूभर हो चुका है। कारण यह कि जल की गहराई तक नलों की पहुंच नहीं है। ऐसे में आधुनिक संसाधनों के माध्यम से जल का दोहन बढ़ा है। जिसे उपलब्ध है वह दुरूपयोग कर रहा है, जिसको मिल नहीं रहा, वह हलकान है। प्रत्येक व्यक्ति को स्वच्छ जल की उपलब्धता दूर की कौड़ी न बन जाए इससे पहले नीतिगत उपायों की आवश्यकता है।

जल संरक्षण के उपायों को लागू करने में देरी करने का अब वक्त नहीं बचा है। जिसके लिए सरकारी एवं आमजन के स्तर पर प्रयासों की तत्काल आवश्यकता है। लेकिन सरकार शायद आमजन को जलविहीन करने पर ही आमदा है। जिसका उदाहरण है जल संसाधन मंत्रालय द्वारा तैयार जल नीति प्रारूप-2012। मंत्रालय ने जनसंख्या वृद्धि एवं बढ़ते शहरीकरण के कारण जल की कमी को स्वीकार किया है एवं जल सुरक्षा को गंभीर चुनौती बताया है।

जलवायु परिवर्तन एवं अत्यधिक दोहन के कारण जल की उपलब्धता के लिहाज से आने वाला समय चुनौतीपूर्ण होगा। सरकार ने जल सुरक्षा को चुनौती तो माना है। लेकिन इस चुनौती का निदान भी सरकार उस निजी क्षेत्र के जरिए पाना चाहती है, जो इस समस्या को बढ़ाने का जिम्मेदार रहा है। जाहिर है, बाजार आम आदमी को पानी बेचकर उसकी जेब तो ढीली कर सकता है लेकिन उसे आसानी से स्वच्छ जल नहीं उपलब्ध करा सकता है। ऐसे में निजी क्षेत्र द्वारा जल संरक्षण की उम्मीद करना बेमानी ही होगा।

 

 

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