परमाणु ऊर्जा एवं सुरक्षा दोनों पहलू आपस में संबद्ध हैं। ऊर्जा के लिए परमाणु संयंत्रों के प्रयास शुरू होते ही परमाणु सुरक्षा को लेकर चिंता भी परवान चढ़ जाती है। फुकुशिमा की दुर्घटना ने भी इस चिंता को वाजिब ठहराने का काम किया है। जिसका असर था कि विश्व की प्रमुख परमाणु शक्तियों जर्मनी, जापान, फ्रांस आदि ने इसके विकल्प तलाशने शुरू कर दिए।

हाल ही में दक्षिण कोरिया में संपन्न हुए परमाणु सुरक्षा सम्मेलन में महाशक्तियों ने भी इस मसले पर चिंता जताई। अमेरिकी राष्ट्रपति ने तो परमाणु जखीरे में कटौती करने का ऐलान किया है। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने परमाणु ऊर्जा की जरूरतों को महत्वपूर्ण बताते हुए सुरक्षा इंतजामों पर चिंता जताते हुए कहा- ‘‘परमाणु ऊर्जा पर लोगों के विश्वास को बनाए रखने के लिए बचाव एवं सुरक्षा के बेहतर मानक तय करने की आवश्यकता है‘‘।

विश्व के प्रमुख 53 देशों के परमाणु सुरक्षा सम्मेलन में फुकुशिमा की दुर्घटना का खौफ दिखाई दे रहा था। इस चिंता को बढ़ाने का इंतजाम पाक के परमाणु हथियारों की असुरक्षा की आशंका, ईरान एवं उत्तर कोरिया के परमाणु कार्यक्रम ने भी किया। वैश्विक स्तर पर परमाणु सुरक्षा के इंतजामों की जरूरत बताते हुए कुछ उपायों पर सहमति नजर आई, जिनमें प्रमुख उपाय हैं-

– परमाणु आतंकवाद से सुरक्षा के मसले पर परस्पर सहयोग के लिए एक मसौदे की आवश्यकता।

– संपन्न देश अंतर्राष्ट्रीय परमाणु सुरक्षा एजेंसी के अनुदान में बढ़ोत्तरी करें, ताकि विकासशील देशों को आपदा के समय सहायता दी जा सके।

– असैन्य परमाणु कार्यक्रमों के लिए यूरेनियम के प्रयोग को न्यूनतम स्तर पर लाया जाए।

– रेडियो ऐक्टिव स्रोतों की सुरक्षा का इंतजाम करना।

– परमाणु बचाव एवं सुरक्षा के इंतजामों के मानकों को और बेहतर किया जाए।

– सभी देशों को परमाणु कचरे के निपटान के लिए उचित प्रयास करने की आवश्यकता है।

– अंतर्राष्ट्रीय परमाणु सुरक्षा एजेंसी एवं इटरपोल को विभिन्न देशों के परमाणु सुरक्षा इंतजामों की जानकारी देने का इंतजाम करना।

– देशों को परमाणु सुरक्षा के मसले पर न्यायिक सहयोग करने की आवश्यकता।

– सभी देशों को सुरक्षित परमाणु संस्कृति विकसित करने के प्रयासों को प्रोत्साहन देना चाहिए।

– परमाणु जखीरे को आतंकवादी शक्तियों से बचाने के लिए सूचना के आदान-प्रदान के पुख्ता इंतजाम करने की आवश्यकता।

परमाणु सुरक्षा सम्मेलन में इंटरपोल को विभिन्न देशों के परमाणु कार्यक्रम की सूचना देने का प्रस्ताव राष्ट्रीय संप्रभुता एवं गोपनीयता का उल्लंघन करता प्रतीत होता है। वहीं परमाणु सुरक्षा के मसले पर परस्पर न्यायिक सहयोग करने का प्रस्ताव भी विभिन्न देशों में दखलंदाजी करने का जरिया हो सकता है। जिसके लिए विकासशील देशों को लामबंदी करने की आवश्यकता है।

परमाणु ऊर्जा की सुरक्षा को लकर सम्मेलन में व्यक्त की गई चिंता यह संकेत करती है कि अब परमाणु ऊर्जा के विकल्पों की तलाश तेज करनी चाहिए। साथ ही मौजूद विकल्पों में निवेश को प्रोत्साहित करना चाहिए। यूरेनियम के कम प्रयोग करने का ऐलान भी यही साबित करता है कि परमाणु ऊर्जा पर आने वाले समय में निर्भरता कम करने के प्रयासों में तेजी आएगी।

ऊर्जा के वैकल्पिक स्रोतों के भविष्य की दृष्टि से ग्रीनपीस की रिपोर्ट उम्मीदें जगाती है। जिसमें देशभर में ऊर्जा के वैकल्पिक स्रोतों के माध्यम से कई गांवों एवं पंचायतों में चल रही सफल परियोजनाओं का ब्यौरा प्रकाशित किया गया है।

भारत में केन्द्र सरकार ने भी अक्षय ऊर्जा स्रोतों पर सब्सिडी दी है। हालांकि यह सब्सिडी केवल व्यक्तिगत स्तर ही अक्षय ऊर्जा के प्रयोग को प्रोत्साहित करेगी। आवश्यकता है कि ऊर्जा के वैकल्पिक स्रोतों के प्रोत्साहन हेतु संस्थागत प्रयास किए जाएं। जिससे आम आदमी को भी उचित दरों पर अक्षय ऊर्जा का लाभ मिल सके। कर्नाटक सरकार ने हाल ही में अक्षय ऊर्जा कोष स्थापित करने का ऐलान किया है। ऐसे ही प्रयास अन्य राज्य सरकारों द्वारा एवं केन्द्र सरकार के द्वारा किया जाने चाहिए।

राजीव गांधी ग्राम विद्युतीकरण परियोजना जैसी फ्लैगशिप योजनाओं में  परमाणु ऊर्जा के विकल्पों को प्रोत्साहन देने के प्रयास करना भी एक बेहतर कदम हो सकता है। परमाणु सुरक्षा को लेकर दक्षिण कोरिया में हुए इस वैश्विक सम्मेलन ने परमाणु ऊर्जा के वैकल्पिक स्रोतों की ओर आगे बढ़ने का संकेत दिया है।

ऐसे में परमाणु ऊर्जा के सहारे विकास को गति देने में लगे देशों के लिए यह विचारणीय है कि वे विकास के लिए परमाणु ऊर्जा की ओर बढ़ें अथवा विकल्पों की तलाश करें। उम्मीद है आने वाला समय परमाणु ऊर्जा के रास्ते से वापस लौटने का होगा।

 

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