रोजगार और पलायन आपस में उत्प्रेरक के समान हैं। यदि ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार की उपलब्धता होती है तो पलायन कम होता है। इसके उलट यदि रोजगार की उपलब्धता नहीं होती है तो बड़ी आबादी शहरों की ओर पलायनकरती है। ग्रामीण क्षेत्र में रोजगार के कम अवसर होने के कारण ग्रामीण भारत शहरों का रूख करने लगा है। भारत में बड़ी आबादी के शहरों में पहुंचने के कारण शहर विस्तार की ओर हैं। वहीं ग्रामीण भारत संकुचन की ओर है।

पिछले कुछ आम बजट में गांवों को सशक्त बनाने के लिए पर्याप्त धन मुहैया कराया गया है। साथ ही विश्व बैंक ने भी भारत के गांवों को संवारने के लिए कर्ज की राशि में राज्यवार बढ़ोत्तरी की है। गांवों के सशक्तिकरण के लिए जो रकम दी जाती है वह मुख्यतः सड़क निर्माण, शौचालय एवं जलापूर्ति के लिए दी जाती है। इन सुविधाओं की पूर्ति से जीवन सरल होता है, परंतु इनसे पहले भी कुछ आवश्यकताएं होती हैं। जिनकी पूर्ति प्राथमिकता के आधार पर पहले होनी चाहिए। यह आवश्यकता है गांवों में रोजगार की एवं उसके अनुसार प्रशिक्षण की।

वर्ष 2012-13 के आम बजट में वित्त मंत्री ने 99,000 करोड़ रू. शौचालय, पेयजल एवं सामाजिक कल्याण की परियोजनाओं के लिए दिया है। यह राशि पिछले बजट की तुलना में 8,000 अधिक है, जिसकी आवश्यकता भी थी। वहीं ग्रामीण क्षेत्र में सड़क परियोजनाओं हेतु 20 प्रतिशत की वृद्धि करते हुए 24,000 हजार करोड़ रू. दिए जाने का ऐलान वित्त मंत्री ने किया है। इसके अलावा मनरेगा को प्रोत्साहन जारी रखते हुए 33,000 करोड़ रू. दिए जाने का ऐलान किया गया है।

वित्त मंत्री ने आम बजट में ग्रामीण क्षेत्र की आवश्यकताओं एवं ढांचागत सुधार के लिए राशि आवंटित करने में कोई कोताही नहीं बरती है। प्रणव दा ने किसानों को ऋण देने में उदारता दिखाते हुए पिछले बजट के 1,00,000 करोड़ रू. के मुकाबले 5,75,000 करोड़ रू. का ऐलान किया है। बजट में गांवों के लिए राशि के आवंटन में कोई कमी नहीं की गई है, परंतु नीतिगत खामियां नजर आती हैं। बजट में गांवों में रोजगार उपलब्ध कराने के उचित प्रयासों का अभाव दिखता है। मनरेगा एवं महिला स्व-सहायता समूह जैसी योजनाएं अकुशल एवं अर्द्धकुशल श्रमिकों के लिए वैकल्पिक रोजगार की भांति हैं।

अकुशल श्रमिक को गांवों में रोजगार मिलना एक सुखद संकेत है लेकिन आदर्श स्थिति वह होगी जब कुशल श्रमिक अथवा सुप्रशिक्षित लोगों को भी गांवों में उचित रोजगार मिल सके। आम बजट में ऐसी योजना का अभाव दिखता है। ग्रामीण क्षेत्रों में लोगों को रोजगार के लिए प्रशिक्षित एवं उनको रोजगार देने की किसी भी ठोस योजना का ऐलान बजट में नहीं है। जिसकी सर्वाधिक जरूरत थी। ग्रामीण क्षेत्रों से पलायन का प्रमुख कारण है अवसरों की कमी एवं कृषि की बढ़ती लागत। जिसके समाधान के लिए दादा ने कोई खाका प्रस्तुत नहीं किया है।

गौरतलब है कि कर्ज की राशि में बढ़ोत्तरी करने से कृषि की लागत कम होने वाली नहीं है, बल्कि कर्ज की राशि बढ़ने से किसानों की समस्याओं में इजाफा हो सकता है। जरूरत थी कृषि की लागत को कम करने की तो दादा ने किसानों के लिए कर्ज लेकर घी पीने का इंतजाम कर दिया। साफ है कि किसानों को अभी राहत के लिए इंतजार करना पड़ेगा। इसके अलावा रोजगार प्रशिक्षण के लिए भी किसी कारगर योजना शुरू करने का साहस वित्त मंत्री ने नहीं दिखाया है। कृषि की लागत को कम करना एवं ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार के प्रशिक्षण की व्यवस्था। यह ऐसे पहलू हैं जिनपर प्रयास करने से बेराजगारी एवं पलायन की समस्या को समान रूप से नियंत्रित किया जा सकता है। जिसके लिए बजट में कोई प्रावधान नहीं है।

शायद यह प्राथमिक समस्याएं भारत के अर्थशास्त्री बहुल मंत्रिमंडल की प्राथमिकताओं की वरीयता सूची में निचले पायदान पर हैं। जिसका परिणाम है कि बजट में राशि का आवंटन तो भरपूर है परंतु ग्रामीण भारत के सशक्तिकरण के लिए किसी दूरगामी योजना का नितांत अभाव है।

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