दिल्ली का जंतर-मंतर। एक ऐसा स्थान जिसे देश भर में धरना-प्रदर्शनों के आयोजन स्थल के रूप में जाना जाता है। जंतर-मंतर प्रतिदिन कई धरना प्रदर्शनों का गवाह बनता है। इन प्रदर्शनों में विभिन्न सामाजिक एवं राजनैतिक संगठनों की सक्रियता रहती है, जो अपनी मांगों को लेकर अनशन अथवा धरने पर बैठते हैं। अनशन और धरना लोकतंत्र में विरोध का एवं अपनी मांगों को मनवाने का प्रमुख हथियार रहा है। जिसके इस्तेमाल में लगी हैं मार्केटिंग कंपनियां।

जंतर-मंतर पर पिछले दो दिनों में अलग ही नजारा देखने को मिला है। यहां करीब 500 लोग अन्ना शैली की टोपी लगाए बैठे हैं। इस टोपी पर लिखा है, बेरोजगार बनाम सरकार। बेरोजगार के रूप में जो लोग अनशन पर बैठे हैं, वे हैं मल्टी लेवल मार्केटिंग कंपनी में कार्यरत लोग। दरअसल, राजस्थान के भीलवाड़ा में वित्तीय अनियमित्ताओं के आरोपों के कारण पुलिस ने कंपनी के स्टोरों पर छापेमारी की थी। वित्तीय अनियमित्ताओं के आरोपों की जांच कर रही पुलिस ने आरसीएम कंपनी के प्रबंधकों के जांच पूरी होने तक देश छोड़ने पर भी रोक लगा दी है।

ऐसे में पुलिसिया कार्रवाई एवं सरकार के कसते शिकंजे से घबराए कंपनी के संचालकों ने अनशन को अपना हथियार बनाया है। विडंबना यह है कि अनशन पर बैठने वाले वे ही लोग हैं जिन्हें कंपनी बडे़ सपने दिखाकर अपने व्यापार में इस्तेमाल करती है। कंपनी उनसे सदस्यता शुल्क लेकर अपना सदस्य बनाती हैं। सदस्यता के बाद उसको सामान बेचने एवं नए लोगों को जोड़ने काम दिया जाता है। जितने लोगों को जोड़ें उतनी ही कमाई। यही इन कंपनियों के धंधे का फंडा है।

मौजूदा समय में बरोजगारी की बढ़ती समस्या एवं लोगों के धन कमाने के लालच ने मल्टी लेवल मार्केटिंग कंपनियों को अवसर प्रदान किया है। यद्यपि भारत में इन कंपनियों का कोई बहुत अधिक विस्तार नहीं है, लेकिन ऐसा शहरी वर्ग इनके शिकंजे में अधिक आया है। जो कामयाबी की आसान राह पकड़ने के लिए लालायित है।

भारत में अभी तक यह कंपनियां अपने विस्तार को तरस रही हैं। इसका कारण यह है कि यह कंपनियां एक ऐसा धंधा करने की बात कहती हैं। जिसमें अपने भरोसेमंद व्यक्ति को अपने नेटवर्क में जोड़कर उससे कमीशन लेने की बात की जाती है। यह कार्य कानूनी तो है परंतु भारत में इसे नैतिक स्वीकार्यता नहीं है। मल्टी लेवल मार्केटिंग कंपनियों पर वर्तमान समय में धोखाधड़ी एवं हेराफेरी के आरोप लगे हैं। जिनमें आरसीएम, कनकधारा, स्टाक गुरू, प्रमुख हैं। केरल सरकार ने तो इन कंपनियों पर कार्रवाई करते हुए इन कंपनियों के लिए दिशानिर्देश जारी कर दिए हैं। जिससे इन कंपनियों के लिए झूठे वादे कर लोगों को ठगना आसान नहीं होगा। राजस्थान सरकार भी ऐसा ही कदम उठा सकती है। जिसके विरोध में आरसीएम ने आमरण अनशन को अपना हथियार बनाया है।

भारत में मल्टी लेवल मार्केटिंग का अस्तित्व सन 1998 में एमवे के आगमन से हुआ था। यह कंपनी मूलतः अमेरिका की है। सच यह है कि मल्टी लेवल मार्केटिंग की विधा की शुरूआत ही अमेरिका के कैलिफोर्निया से हुई  है। मल्टी लेवल मार्केटिंग उपभोक्तावादी दुनिया का वह फंडा है, जो उपभोक्ता के करीबी व्यक्ति को ही विक्रेता के रूप में उसके पास भेजती है। मल्अी लेवल मार्केटिंग के धंधे में बाजार का प्रतिनिधि उपभोक्ता के परस उसका मित्र अथवा रिश्तेदार बनकर जाता है और उसको वस्तु के उपभोग अथवा उपयोग के लिए आकर्षित करता है। इस विधा की आवश्यकता उस वक्त पड़ती है, जब बाजार आम तरकीबों से उपभोक्ताओं को आकर्षित नहीं कर पाता है।

मल्टी लेवल मार्केटिंग कंपनियों का यह अनशन भारत में उनके विस्तार न होने की चिंता का परिणाम है। जिसको लेकर इन कंपनियों ने अनशन जैसे उपक्रम का सहारा लिया है। दरअसल, मल्टी लेवल मार्केटिंग कंपनियों को उनके मूल स्थान अमेरिका में ही कामयाबी नहीं मिल पाई है। जैसे-

अमेरिका के फेडरल ट्रेड कमीशन ने 1979 में एमवे को मूल्य निर्धारण एवं आय के अतिरंजित दावे करने का दोषी पाया था। जिसके बाद कमीशन ने इन कंपनियों पर निगरानी रखे जाने की बात कही थी, जो उत्पाद की बिक्री से ज्यादा लोगों की भर्ती पर विश्वास रखती हैं।

वहीं वाल्टर जे कार्ल ने अपने लेख में कहा है- ‘‘यह कंपनियां उपभोक्ताओं के करीबी लोगों का इसी प्रकार इस्तेमाल करती हैं, जैसे किसी व्यापारिक संगठन द्वारा बाइबल का अनैतिक इस्तेमाल करना।‘‘

स्पष्ट है कि मल्टी लेवल मार्केटिंग का फंडा उस पूंजीवादी व्यवस्था में ही खारिज हो गया है, जहां उसकी शुरूआत हुई थी। ऐसे में भारत में पूंजीवाद के इस उपक्रम को कामयाबी मिलना असंभव प्रतीत होता है। जंतर-मंतर पर धरने पर बैठी इन कंपनियों की यह हालत बयां करती है कि भारत में निहायती पूंजीवादी यह उपक्रम अपना कारोबार समेटने के कगार पर हैं।

 

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