भारत में पत्रकारिता का क्षेत्र राजनीति, अर्थव्यवस्था और वैश्विक उथल-पुथल की जानकारी देने तक ही सीमित नहीं है। भारत वह संस्कृति है जो विभिन्न आघातों और संक्रमण के बाद भी अपने मूल रूप में विद्यमान है। भारत की महान संस्कृति के यशोगान के लिए पत्रकारिता ने भी अपना योगदान दिया है। जिसे प्रायः सांस्कृतिक पत्रकारिता भी कहते हैं। संस्कृति का व्याख्यान करना और उसके आयामों को स्पष्ट करने का कार्य सांस्कृतिक पत्रकारिता के माध्यम से होता आया है। भारत में सांस्कृतिक पत्रकारिता की श्रृंखला में गीता प्रेस के संस्थापक सदस्य रहे हनुमान प्रसाद पोद्दार का नाम भी उल्लेखनीय है।

हनुमान प्रसाद पोद्दार का जन्म शनिवार, 17 दिसंबर, 1890 को राजस्थान के रतनगढ़ में हुआ था। उनके पिता का नाम भीमराज तथा माता का नाम रिखीबाई था। बाल्यावस्था में ही बालक हनुमान की माता रिखीबाई कभी न पूर्ण होने वाली कमी देकर चली गईं। उसके पश्चात दादी मां रामकौर देवी ने ही बालक का पालन-पोषण किया। दादी रामकौर देवी के सान्निध्य में बालक को भारतीय परंपरा और संस्कृति विरासत में मिली थीं, जिसकी उन्होंने अपने लेखन के माध्यम से आजीवन सेवा की।

‘कल्याण‘ मासिक पत्र के संपादक के रूप में पोद्दार जी का पत्रकारिता के क्षेत्र में विशेष स्थान है। ‘कल्याण‘ के संपादक के रूप में हनुमान प्रसाद जी को विश्व भर के आध्यात्म प्रेमियों के बीच लोकप्रियता मिली। ‘कल्याण‘ के संपादन के अलावा उनको गीता-प्रेस में दिए गए योगदान के लिए जाना जाता है। गीता-प्रेस के आजीवन ट्रस्टी रहे पोददार जी की गीता-प्रेस के संस्थापक जयदयाल गोयनका से प्रगाढ़ मित्रता थी। जयदयाल गोयनका को गीता में गहरी रूचि थी, वे प्रतिदिन गीता का अध्ययन किया करते थे और विभिन्न स्थानों में घूम-घूम कर गीता का प्रचार भी किया करते थे। गीता को आमजन तक पहुंचाने के लिए शुद्ध पाठवाली पुस्तक की आवश्यकता थी जो उस समय उपलब्ध नहीं थी।

गोयनका जी ने गीता की व्याख्या कर कलकत्ता के वणिक प्रेस से पांच हजार प्रतियां छपवायीं। जिसमें मुद्रण से संबंधित विभिन्न गलतियां थीं, अतः उन्होंने धार्मिक-आध्यात्मिक प्रकाशन हेतु सन 1923 में गीता-प्रेस की स्थापना की। गीता-प्रेस की स्थापना यद्यपि जयदयाल गोयनका ने की, किंतु संपादन की जिम्मेदारी हनुमान प्रसाद पोद्दार के पास ही थी। वे गीता-प्रेस के ट्रस्टी भी थे।

गीता प्रेस के माध्यम से उन्होंने भारतीय संस्कृति की सेवा करते हुए भारत के समृद्ध ग्रंथों एवं परंपराओं की व्याख्या कर उनको जन-जन तक पहुंचाने का कार्य किया। भारतीय संस्कृति को लेकर किसी प्रकाशन ने यदि कोई पहल की है तो निर्विवाद रूप से गीता प्रेस उनमें से प्रथम है। हनुमान प्रसाद पोद्दार ने मुख्यतः आध्यात्मिक विषयों पर ही लिखा है, उन्होंने अपने लेखन की शुरूआत विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में लेख एवं निबंधों के लेखन से की थी। उनके लेख एवं निबंधों का पुस्तक रूप में संकलन कर उनको श्रद्धांजलि देते हुए ‘पावन स्मरण‘ किया गया है। उनके लेखों एवं निबंधों को निम्न चार श्रेणियों में दिया गया है-

1- आध्यात्मिक

2- राष्ट्रीय

3- नीतिमूलक

4- विधि (परामर्शमूलक, संस्मरणात्मक, सामाजिक)

उन्होंने निबंधों एवं लेखों के अलावा विभिन्न टीका साहित्य का भी सर्जन किया। हनुमान प्रसाद पोद्दार ने रामचरितमानस, विनयपत्रिका, दोहावली की विशद टीका प्रस्तुत की।सन 1927 में गीता-प्रेस से ही ‘कल्याण‘ का भी प्रकाशन होने लगा। ‘कल्याण‘ के प्रकाशन की शुरूआत का भी बड़ा रोचक प्रसंग है। सन 1926 में मारवाड़ी अग्रवाल महासभा का अधिवेशन दिल्ली में होना था। उस अधिवेशन के स्वागताध्यक्ष आत्माराम खेमका थे। वे शास्त्रज्ञ थे, किंतु हिंदी में व्याख्यान नहीं लिख सकते थे। सेठ जयदयाल गोयनका की प्रेरणा से स्वागत भाषण लिखने की जिम्मेदारी हनुमान प्रसाद पोद्दार को दी गई। हनुमान प्रसाद जी के लिखे स्वागत भाषण ने अधिवेशन में आए लोगों को मुग्ध कर दिया। इस स्वागत भाषण को सुनने के बाद सेठ जमुनालाल बजाज ने हनुमान प्रसाद जी को पत्र चलाने का प्रस्ताव दिया। यही प्रस्ताव आगे चलकर ‘कल्याण‘ मासिक पत्र के रूप में सामने आया। ‘कल्याण‘ का प्रथम अंक प्रकाशित हुआ जिसके मुख पृष्ठ पर ‘वन्दौ चरन सरोज तुम्हारे‘ पद छपा था। संपादकीय पृष्ठ पर ‘कल्याण‘ का उददेश्य लिखित था जिसके शब्द इस प्रकार थे-

‘‘कल्याण की आवश्यकता सब को है। जगत में ऐसा कौन मनुष्य है जो अपना कल्याण नहीं चाहता। उसी आवश्यकता का अनुभव कर आज यह ‘कल्याण‘ भी प्रकट हो रहा है।‘‘(हनुमान प्रसाद पोद्दार, डा. ब्रजलाल वर्मा)

‘कल्याण‘ के लिए हनुमान जी ने जो नीति बनाई थी उसमें विज्ञापनों के लिए कोई स्थान नहीं था। ‘कल्याण‘ की शुरूआत में पोद्दार गांधी जी से मिलने गए थे, उस मुलाकात में ‘कल्याण‘ को लेकर जो सीख गांधी जी ने दी हनुमान प्रसाद पोद्दार ने उसका सदा पालन किया। ‘कल्याण‘ की शुरूआत की बात सुनकर गांधी जी अत्यधिक हर्षित होते हुए बोले-

‘‘कल्याण में दो नियमों का पालन करना। एक तो कोई बाहरी विज्ञापन नहीं देना दूसरे, पुस्तकों की समालोचना मत छापना‘‘।

अपने इन निर्देशों को ठीक प्रकार से समझाते हुए गांधी जी ने कहा- ‘‘तुम अपनी जान में पहले यह देखकर विज्ञापन लोगे कि वह किसी ऐसी चीज का न हो जो भद्दी हो और जिसमें जनता को धोखा देकर ठगने की बात हो। पर जब तुम्हारे पास विज्ञापन आने लगेंगे और लोग उनके लिए अधिक पैसे देने लगेंगे तब तुम्हारे विरोध करने पर भी…साथी लोग कहेंगे…देखिए इतन पैसा आता है क्यों न विज्ञापन स्वीकार कर लिया जाए?‘‘। (पत्रकारिता के युग निर्माता- रजनीश कुमार चतुर्वेदी)

महात्मा गांधी की इस सीख का ही परिणाम था कि हनुमान प्रसाद पोद्दार जी ने विज्ञापनों के लिए अपने पत्र में कोई स्थान नहीं रखा था। ‘कल्याण‘ ने बहुत कम समय में ही पत्रकारिता जगत में अपनी प्रतिष्ठा कायम कर ली थी। ‘कल्याण‘ की लोकप्रियता को देखते हुए गीता-प्रेस के चिंतकों का यह विचार बना कि ‘कल्याण‘ की रचनाओं को विश्व भर के आध्यात्म प्रेमियों तक पहुंचाया जाना चाहिए। इस उद्देश्य की पूर्ति हेतु जनवरी, 1934 में ‘कल्याण‘ के अंगे्रजी संस्करण की शुरूआत ‘कल्याण-कल्पतरू‘ नाम से की गई।

सांस्कृतिक पत्रकारिता के स्तंभ हनुमान प्रसाद पोद्दार जी के पत्रकार जीवन में ‘कल्याण‘ के बाद भी कई पड़ाव आने शेष थे। जो ‘कल्याण-कल्पतरू‘ एवं ‘महाभारत मासिक पत्रिका‘ के रूप में सामने आए। ‘महाभारत मासिक पत्रिका‘ का प्रकाशन सन 1955 से लेकर सन 1966 तक अनवरत चलता रहा।

हनुमान प्रसाद पोद्दार जी की पत्रकारिता भारत की महान सनातन संस्कृति के यशोगान को समर्पित थी। उनकी लेखनी भारतीय संस्कृति के रक्षार्थ ही चला करती थी, जिसकी बानगी उनके एक लेख के इन शब्दों में मिलती है-

‘‘भारतवर्ष ऋषि-मुनियों की भूमि और धर्म का क्षेत्र है। यहां गो-हत्या की कल्पना नहीं होनी चाहिए। यहां आज भारतीयों की स्वतंत्र सरकार होने पर भी भारतवासी अत्यंत दुखपूर्ण हृदय से प्रतिदिन 30 हजार गायों की नृशंस हत्या देख रहे हैं और सरकार से इस महापाप का परित्याग कर देने के लिए अनुरोध कर रहे हैं। धर्म प्राण भारत में गो-हत्या निवारण के लिए आंदोलन करना तथा साधु-महात्माओं को जेल जाना और प्राणोत्सर्ग करना पड़ रहा है। यह वास्तव में लज्जा और दुर्भाग्य की बात है‘‘। (हनुमान प्रसाद पोद्दार, डा. ब्रजलाल वर्मा)

अपने संपूर्ण साहित्यिक एवं पत्रकारिता के जीवन में हनुमान प्रसाद पोद्दार अपने लेखन के माध्यम से भारतीय संस्कृति का सुव्याख्यान करते रहे। सन 1969 में हनुमान प्रसाद पोद्दार जी पेट की गंभीर बीमारी के शिकार हो गए, लंबी बीमारी के पश्चात 22 मार्च, सन 1971 को हनुमान प्रसाद पोद्दार जी ने अपने प्राण त्याग दिए। विश्व कल्याण की भावना को संचारित करने वाला वह महामानव इस दुनिया से विदा हो गया।

उनका जाना भारत के सांस्कृतिक लेखन की अपूर्णीय क्षति थी। हनुमान प्रसाद पोद्दार को श्रद्धांजलि देते हुए तत्कालीन नेपाल नरेश ने कहा-

‘‘मैं तीन दशकों से भी अधिक समय से श्री हनुमान प्रसाद पोद्दार को ‘कल्याण‘ में प्रकाशित उनके लेखों के माध्यम से जानता हूं और मैं कह सकता हूं कि श्री पोद्दार का जीवन एक उत्थानकारी और महान उद्देश्य के प्रति पूर्ण समर्पण था।‘‘

हनुमान प्रसाद पोद्दार ने भारत की सनातन हिन्दू संस्कृति की आजीवन सेवा की थी। चक्रवर्ती राजगोपालाचारी के शब्दों में-

‘‘श्री हनुमान प्रसाद पोद्दार ने हिन्दू-धर्म की स्मरणीय सेवाएं की हैं। यह सर्वथा उचित है कि उनकी सेवाओं को उपयुक्त ढंग से सम्मानित किया जाए‘‘।

पोद्दार जी ने भारतीय संस्कृति एवं धार्मिक साहित्य की सेवा की। इसका ही सुपरिणाम है कि गीता-प्रेस ने उचित मूल्य एवं सरल भाषा में भारत के सामाजिक धार्मिक साहित्य को जन-जन तक पहुंचाने का कार्य किया है। उनके योगदान को रेखांकित करते हुए लोकनायक जयप्रकाश नारायण ने कहा-

‘‘कल्याण के संपादक और गीता-प्रेस के संचालक-प्रकाशक स्वर्गीय श्री हनुमान प्रसाद पोद्दार ने अपने प्रकाशनों के माध्यम से भारतीय साहित्य की विशेषकर धार्मिक साहित्य की मूल्यवान सेवा की है। आजकल धर्मनिरपेक्षता के नाम पर धर्मग्रंथों की उपेक्षा करने का रिवाज सा अपने देश में चल पड़ा है। इस दृष्टि से यदि देखें तो गीताप्रेस ने अपने धर्म-ग्रंथों को वृहत पैमाने पर प्रचारित और प्रकाशित कर एक महत्वपूर्ण सेवा कार्य किया है और इसका मुख्य श्रेय हनुमान प्रसाद पोद्दार के साधनापूर्ण समर्पित जीवन एवं व्यक्तित्व को है। (हनुमान प्रसाद पोद्दार, डा. ब्रजलाल वर्मा)

लोकनायक जयप्रकाश नारायण की यह बात अक्षरशः सत्य जान पड़ती है कि धर्मनिरपेक्षता के नाम पर विस्मृत कर दिए गए ग्रंथों के पुनरावलोकन के कार्य में पोद्दार जी का महत्वपूर्ण योगदान है। यद्यपि पोद्दार जी हमारे बीच नहीं हैं किंतु, सांस्कृतिक पत्रकार के रूप में दिया गया उनका योगदान पत्रकारिता में उपजी सांस्कृतिक रिक्तता को पूर्ण करने की प्रेरणा देता है।

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