भारत में क्रिकेट की बात हो और सचिन चर्चा से परे हों ऐसा कम ही देखने को मिलता है। सचिन के नाम को भारत मेंक्रिकेट प्रेमी क्रिकेट का पर्याय मानते हैं। सचिन की महान उपलब्धियों ने देश को गौरवान्वित होने के ढेरों मौके दिए हैं। कह सकते हैं कि वे अपने लाजवाब खेल की वजह से देश के गौरव हैं। पिछले एक बरस से देश के और क्रिकेट जगत के गौरव सचिन अपने सौवें शतक के इंतजार में थे। संयोग से यह इंतजार उस दिन समाप्त हुआ जब इंतजार के बाद ही देश का आम बजट भी संसद में प्रस्तुत किया जा रहा था।

देश का आम बजट देश के वर्ष भर की आय-व्यय का लेखा-जोखा होता है। जिसका प्रभाव हर खास-ओ-आम पर पड़ता है। ऐसे में यह बजट गणतंत्र के नागरिकों के लिए महत्व का विषय होता है। गणतंत्र के नागरिकों के लिए महत्व के विषय की जानकारी को उन तक पहुंचाने का दायित्व जनसंचार माध्यमों का है। दायित्व होना और उसे समझना दोनों ही अपने आप में अलग विषय हैं। शायद भारतीय मीडिया उस समझ से अभी परे ही है।

देश का बजट और सचिन का शतक। इसमें मीडिया की प्राथमिकता में क्या होना चाहिए यह कोई विचारणीय प्रश्न नहीं। निर्विवाद रूप से मीडिया की पहली प्राथमिकता बजट के समाचार एवं उसके विभिन्न पहलुओं को लोगों तक पहुंचाना होना चाहिए। पर ऐसा हुआ नहीं। मीडिया अपने टीआरपी के झंझावतों के मददेनजर सचिन के महाशतक के विभिन्न बनावटी पहलुओं को लोगों को बताता रहा। वहीं इलैक्ट्रोनिक मीडिया की स्क्रीन और प्रिंट मीडिया के पृष्ठों में खबरों के बजट में आम बजट को सही अनुपात में प्रतिनिधितव न मिल सका।

जहां बजट को उसके अनुपात में महत्व मिला वहां सर्वाधिक प्रयास आम बजट को धूमिल करने के ही थे। अर्थातसचिन के शतक के मुकाबले देश के बजट को बौना साबित करने का सुनियोजित प्रयास। उदाहरण के तौर पर दैनिक जागरण की बैनर खबर को ही लें, जिसका शीर्षक था ‘‘सरकार जीरो-सचिन हीरो‘‘। यह बजट को नकारने जैसा शीर्षक था। लगभग इसी तरह का प्रयास करते हुए अमर उजाला का शीर्षक था ‘‘दिल लिया-दर्द दिया‘‘। इनसे बड़ी लकीर खींचते हुए नई दुनिया ने सचिन तेंडुलकर की आदमकद तस्वीर प्रस्तुत करने का प्रयास किया। उस तस्वीर के नीचे एक कोने में देश के बजट को भी जगह मिली थी।

कह सकते हैं कि दादा के बजट की दादागिरी खबरों में नहीं चली। वहीं खबरिया चैनलों में भी क्रिकेट विशेषज्ञ आंकड़ों के माध्यम से बता रहे थे कि सचिन का महाशतक देशवासियों के लिए कितनी राहत का विषय हो सकता है। लेकिनआम बजट आम आदमी के लिए क्या सहूलियतें और दुश्वारियां लेकर आया है, इसकी जानकारी देने वाले उपलब्ध नहीं थे।

खबरों के बजटीकरण में देश के आम बजट के पिछड़ने पर यह पंक्तियां सटीक जान पड़ती हैं-

देश इस समय कई समस्याओं से गुजरा है,

सचिन का शतक समस्या बन उभरा है।

बात सही है कि सचिन के शतक को मीडिया ने राष्ट्रव्यापी समस्या के सुलझने जैसा बताया। उल्लेखनीय है कि जिस मैच में सचिन ने महाशतक बनाया उसी मैच में किरकिरी कराते हुए भारतीय टीम औसत दर्जे की टीम बांग्लादेश से पराजित हो गई। भारतीय टीम की यह हार भी खबरों का हिस्सा नहीं बनी। ऐसे में यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या भारतीय टीम की जीत से महत्वपूर्ण सचिन का शतक है।

उल्लेखनीय है कि आम बजट से अधिक महत्व देते हुए जिस क्रिकेट को अधिक महत्व दिया गया उसमें भी भारत की हार की अपेक्षा सचिन का शतक चर्चा का विषय रहा। यह विचारणीय है कि राष्ट्रीय मीडिया के लिए राष्ट्रीय महत्व का विषय सचिन का शतक है, या आम बजट। हालांकि आम बजट को लेकर मीडिया की यह उदासीनता कई मामलों में घिरी सरकार के लिए राहत भरी हो सकती है। किंतु, भारत का आम जनमानस बजट की समुचित जानकारी से वंचित रह गया इसका जिम्मेदार किसे ठहराया जाएगा। मीडिया की बेरूखी को या सचिन के शतक को।

 

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