वर्तमान समय में सोशल मीडिया अथवा न्यू-मीडिया के सकारात्मक पक्षों पर उतनी चर्चा नहीं हुई है, जितनी उसके नकारात्मक पक्षों की। इसका कारण यह है कि लगाम कसने से पहले उसको बदनाम करना, सरकार जरूरी समझती है। देश में ग्रेजुएट बेरोजगारों की बढ़ती संख्या को सरकार की कुनीतियों का विरोध करने में ही अपनी समस्याओं का निदान दिखाई पड़ता है। सरकारी नीतियों से त्रस्त निरीह जनता का गुस्सा यदि सोशल साइट्स के माध्यम से निकलता है तो भी यह सरकार के लिए कम नुकसानदेह है। यह सरकार को समझना चाहिए। सोशल मीडिया ने अभी तक विभिन्न आंदोलनों और सामाजिक बहसों को चलाने में युवाओं को एक मंच प्रदान किया है। जिसका उपयोग सरकार की कुनीतियों के विरूद्ध आंदोलनों को खड़ा करने के लिए भी किया गया। यही सरकारी फिक्र का भी कारण है।

केन्द्रीय दूरसंचार मंत्री कपिल सिब्बल ने विभिन्न सोशल साइटों को आपत्तिजनक और अश्लील सामग्री हटाने की चेतावनी दी थी। जिसका समर्थन भारतीय प्रेस परिषद के अध्यक्ष मार्कंडेय काटजू ने भी किया है। फेसबुक और गूगल सहित विभिन्न साइटों द्वारा कंटेंट पर निगरानी करने को लेकर हाथ खड़े करने पर मुकदमेबाजी भी हुई। जिसमें कोर्ट ने सरकार की नीतियों को सही ठहराया है।

जिस प्रकार से ‘सागर की लहरों को जहाज तय नहीं करते‘, उसी प्रकार से न्यू-मीडिया पर निगरानी और उसके योगदान को तय करना भी सरकार के एजेंडे से बाहर का काम है। सांप्रदायिकता भड़काने वाली सामग्री और अपमानजनक टिप्पणियों का हवाला देते हुए कपिल सिब्बल ने सोशल नेटवर्किंग साइट्स के अधिकारियों की क्लास ली है। इससे पहले सिब्बल को यह ध्यान भी देना चाहिए कि ‘जाति-बिरादरी‘ और सांप्रदायिक आधार पर चुनावों के समीकरणों को प्रभावित करने से क्या माहौल नहीं बिगड़ता है? दिल्ली में राष्ट्रविरोधी बयान देने वालों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर छोड़ दिया जाता है, क्या उनके बयान सांप्रदायिक उन्माद पैदा नहीं पैदा करते हैं? गौरतलब है कि इन साइटों पर प्रकाशित किसी भी अश्लील एवं अनैतिक सामग्री को उपयोगकर्ताओं द्वारा बहुत अधिक महत्व नहीं दिया गया है। जिस प्रकार से परंपरागत मीडिया की निगरानी का जिम्मा पाठकों और स्वायत्त संस्थाओं पर है, उसी प्रकार से न्यू-मीडिया को भी उपयोगकर्ताओं के विवेक पर ही छोड़ देना चाहिए।

अमेरिका में भी पायरेसी से संबंधित दो विधेयकों को लाए जाने के विरोध में  विकिपीडिया का अंग्रेजी संस्करण 24 घंटे बंद रहा है। विकिपीडिया एवं अन्य साइटों का कहना है कि पायरेसी के नाम पर लाये गये यह विधेयक उन पर शिकंजा कसने का प्रयास हैं। इससे साबित होता है कि विकिलीक्स से हलकान हो चुका अमेरिका अब न्यू-मीडिया के प्रकल्पों को उन्मुक्त नहीं रहने देना चाहता। इससे पहले कि वॉल स्ट्रीट आंदोलन जैसा कोई और आंदोलन सरकार की चूलें हिलाने लगे अमेरिकी सरकार विभिन्न साइटों पर शिकंजा कसने की तैयारियों में जुट गई है। जिसे भारी विरोध का सामना करना पड़ रहा है।

जिस प्रकार से न्यू-मीडिया ने अरब के रेतीले मैदानों से लेकर चीन की साम्यवादी, अमेरिका की पूंजीवादी एवं भारत की लोकतांत्रिक सरकार के खिलाफ होने वाले आंदोलनों को बल प्रदान किया है। उसी तेजी से विभिन्न देशों  की सरकारों ने भी पलटवार करते हुए न्यू-मीडिया की प्रतिनिधि साइटों पर लगाम कसने की ठानी है। अर्थात न्यू-मीडिया पर नियंत्रण के वैश्विक उपाय किए जाने लगे हैं। जिनका प्रतिरोध करना न्यू-मीडिया के लोकतांत्रिक स्वरूप को बनाए रखने के लिए जरूरी है। लोकतंत्र और आम आदमी के अस्तित्व की लड़ाई लड़ने वाले सोशल मीडिया को अब अपने अस्तित्व की लड़ाई भी लड़नी पड़ेगी। जनसंचार माध्यमों पर लगाम कसने पर नए माध्यमों का सदैव ही अभ्युदय हुआ है। इसी क्रम में यदि इन वेबसाइटों पर लगाम लगती भी है, तो निश्चित ही नए माध्यम उभरकर आएंगे। इसलिए यह जरूरी होगा कि सरकारें अपनी नीतियों को आम जनोन्मुख बनाएं, न कि आम आदमी की अभिव्यक्तियों को रोकने का प्रयास करें।

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