पत्रकारिता की विधा को साहित्य के अंतर्गत माना जाता है। पत्रकारिता को तात्कालिक साहित्य की भी संज्ञा दी गई है। यही कारण है कि समय-समय पर विभिन्न साहित्यकारों ने पत्रकारिता में अपना योगदान और पत्रकारों को मार्गदर्शन देने का कार्य किया। ऐसे ही व्यक्तित्व थे, सच्चिदानंद हीरानंद वात्साययन अज्ञेय जिन्होंने साहित्य और पत्रकारिता दोनों में ही समान रूप से अपना योगदान दिया। अज्ञेय ने ‘दिनमान‘ पत्रिका के संपादक के रूप में पत्रकारिता में नए मानदंड स्थापित किए। शायद यही कारण था कि अज्ञेय पत्रकारों एवं संपादकों के कार्य एवं उत्तरदायित्व को लेकर चिंतित रहे। अज्ञेय ने संपादकों की कम होती प्रतिष्ठा के लिए संपादकों को ही जिम्मेदार ठहराया था। अपनी चिंता को अज्ञेय ने इन शब्दों में व्यक्त करते हुए कहा कि-
‘‘हिन्दी पत्रकारिता के आरंभ के युग में हमारे पत्रकारों की जो प्रतिष्ठा थी, वह आज नहीं है। साधारण रूप से तो यह बात कही जा सकती है, अपवाद खोजने चलें तो भी यही पावेंगे कि आज का एक भी पत्रकार या संपादक वह सम्मान नहीं पाता जो कि पचास-पचहत्तर वर्ष पहले के अधिकतर पत्रकारों को प्राप्त था। आज के संपादक पत्रकार अगर इस अंतर पर विचार करें तो स्वीकार करने को बाध्य होंगे कि वे न केवल कम सम्मान पाते हैं, बल्कि कम सम्मान के पात्र हैं- या कदाचित सम्मान के पात्र बिल्कुल नहीं हैं, जो पाते हैं पात्रता से नहीं इतर कारणों से।‘‘ (‘आत्मपरक‘ से साभार उद्धृत)

अज्ञेय ने संपादक के रूप में बहुत ख्याति प्राप्त की थी, उनके अपने निश्चित मानदंड थे, जिससे उन्होंने कभी समझौता नहीं किया। अज्ञेय ने अपने पत्रकार जीवन की शुरूआत ‘‘सैनिक‘‘ से की थी अज्ञेय 1 वर्ष तक ‘‘सैनिक‘‘ के संपादक मंडल में रहे। जिसके पश्चात वे ‘‘विशाल भारत‘‘ में डेढ़ वर्ष तक रहे। सन् 1947 में अज्ञेय ने साहित्यिक त्रैमासिक ‘‘प्रतीक‘‘ निकाला। इस पत्र में उन्होंने उदीयमान साहित्यकारों को स्थान दिया। अज्ञेय के उत्कृष्ट संपादन का ही परिणाम था कि ‘‘प्रतीक‘‘ का स्तर कभी गिरा नहीं। सन् 1965 में अज्ञेय जी ने साप्ताहिक ‘‘दिनमान‘‘ का संपादन आरंभ किया। यह कार्य उन्होंने उस समय में प्रारंभ किया जब उनका स्वास्थ्य भी ठीक नहीं चल रहा था, परंतु उनका पत्रकार मन ‘‘दिनमान‘‘ को सफलता की ऊंचाइयों पर ले जाने के लिए व्याकुल था। उनके संपादन में ‘‘दिनमान‘‘ ने राष्ट्रीय स्तर पर ख्याति अर्जित की। इसका कारण शायद अज्ञेय जी की संपादन नीति ही थी जिससे उन्होंने कभी समझौता नहीं किया। उनके अपने निश्चित मानदंड थे जिन पर वे कार्य करते थे। उन्होंने संपादकों एवं पत्रकारों को भी मानदंडों पर चलने को प्रेरित किया। नीतिविहीन कार्य को ही उन्होंने पत्रकारों एवं संपादको की घटती प्रतिष्ठा का कारण बताया था। उन्होंने कहा कि-

‘‘अप्रतिष्ठा का प्रमुख कारण यह है कि उनके पास मानदंड नहीं है। वहीं हरिशचन्द्रकालीन संपादक-पत्रकार या उतनी दूर ना भी जावें तो आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी का समकालीन भी हमसे अच्छा था। उसके पास मानदंड थे, नैतिक आधार थे और स्पष्ट नैतिक उद्देश्य भी। उनमें से कोई ऐसे भी थे जिनके विचारों को हम दकियानूसी कहते, तो भी उनका सम्मान करने को हम बाध्य होते थे। क्योंकि स्पष्ट नैतिक आधार पाकर वे उन पर अमल भी करते थे- वे चरित्रवान थे।‘‘ (‘आत्मपरक‘ से साभार उद्धृत)

अज्ञेय जी का मानना था कि पत्रकार अथवा संपादक को केवल विचार क्षेत्र में ही बल्कि कर्म के नैतिक आधार के मामले में भी अग्रणी रहना चाहिए। भारतीय लोगों पर उन व्यक्तियों का प्रभाव अधिक पड़ा है जिन्होंने जैसा कहा वैसा ही किया। ‘‘पर उपदेष कुशल बहुतेरे‘‘ की परंपरा पर चलने वाले लोगों को भारत में अपेक्षाकृत कम ही सम्मान मिल पाया है। संपादकों एवं पत्रकारों से कर्म क्षेत्र में अग्रणी रहने का आह्वान करते हुए उन्होंने कहा कि-

‘‘आज विचार क्षेत्र में हम अग्रगामी भी कहला लें, तो कर्म के नैतिक आधारों की अनुपस्थिति में निजी रूप से हम चरित्रहीन ही हैं और सम्मान के पात्र नहीं हैं।‘‘ (‘आत्मपरक‘ से साभार उद्धृत)

सच्चिदानंद हीरानंद वात्साययन अज्ञेय उन पत्रकारों में से थे जिन्होंने पत्रकारिता में साहित्य के कलेवर को स्थान दिया। उन्होंने साहित्यिक और गैर-साहित्यिक पत्रकारिता में भी सक्रिय महत्वपूर्ण योगदान दिया। हिन्दी पत्रकारिता में साहित्यिक पत्रकारिता की कम होती भूमिका के प्रति वे सदैव चिंतित रहे। उन्होंने कहा था-

‘‘हिंदी पत्रकारिता में बहुत प्रगति हुई है, परंतु साहित्यिक पत्रकारिता में उतनी नहीं हुई है।‘‘

अज्ञेय पत्रकारिता को विश्वविद्यालय से भी महत्वपूर्ण और ज्ञानपरक मानते थे। इसका एक उदाहरण है जब योगराज थानी पीएचडी करने में लगे हुए थे, तब अज्ञेय जी ने उनसे कहा कि-

‘‘पत्रकारिता का क्षेत्र विश्वविद्यालय के क्षेत्र से बड़ा है, आप पीएचडी का मोह त्यागिए और इसी क्षेत्र में आगे बढि़ए।‘‘
अज्ञेय ने पत्रकारिता और साहित्य में विभिन्न मानदंड स्थापित किए। सर्वेश्वर दयाल सक्सेना द्वारा लिए गए साक्षात्कार का हवाला देना यहां प्रासंगिक होगा, जिसमें उन्होंने कहा-

‘‘मैं समझता रहा हूं कि साहित्यकार को समय-समय पर अपना महत्वपूर्ण अभिमत प्रकट करना चाहिए, परंतु अपने साहित्यिक व्यक्तित्व का ऐसा सामाजिक उपयोग होने देने में उसे दलबंदी से बचना चाहिए क्योंकि बिना इसके वह अपने निजी उत्तरदायित्व से स्खलित हो जाता है।‘‘

अज्ञेय जी वे पत्रकार थे जिन्होंने पत्रकारिता में साहित्य के सरोकारों को महत्वपूर्ण स्थान दिया। अज्ञेय ने पत्रकारिता में जो पदचिन्ह् स्थापित किए वे आज भी पत्रकार समाज के लिए मार्गदर्शन स्वरूप हैं। आज जब पत्रकारिता के आत्मावलोकन का मुद्दा एक बार फिर खड़ा हो गया है, ऐसे समय में अज्ञेय की पत्रकारिता और उनके मूल्य पत्रकारिता को नैतिक राह दिखाने का कार्य करते हैं।

Comments on: "पत्रकारिता में मानदंडों का अभाव- सच्चिदानंद हीरानंद वात्साययन अज्ञेय" (2)

  1. VIKAS SAXENA said:

    प्रिय सर,
    इस लेख में आप ने जो भी लिखा है वह सत्य का बोध कराता है। लेकिन प्रारम्भ की पंक्तियों में आपने लिखा है कि आज के पत्रकार वह सम्मान प्राप्त नहीं कर पाते हैं जो कि हमारे पूर्व पत्रकार प्राप्त करते थे। इस पर मै कहना चाहूंगा कि शायद आज के पत्रकारों को उन सभी चीजों पर ध्यान केंद्रित करना होता है, जो पूर्व पत्रकार अपने जीवन काल में छोड़ चुके हैं। अर्थात छोटे-2 पहलूओं को जहन में रखना होता है, जो अब तक बीत चुका है, यानी मस्तिष्क विशाल भंडार हो। लेकिन पूर्व पत्रकारों को अपने समय और समय से पहले की बातों को ध्यान में रखना होता था, यानी मस्तिष्क छोटा भंडार। और फिर कंपटीशन का जमाना हो तो मस्तिष्क का विकास या तो बहुत तेज गति से होता है या फिर मस्तिष्क आधी चीजों को छोड़- छोड़कर चलता है। शायद यही बात आज के पत्रकारों पर लागू होती है। सर मै खुद एक पत्रकार हूं, और आपकी बातों से पूर्णरूप से सहमत हूं।

    विकास सक्सेना

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / Change )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / Change )

Connecting to %s

Tag Cloud

%d bloggers like this: