मैं जिंदगी का साथ निभाता चला गया,

हर फिक्र को धुएं में उड़ाता चला गया।

जिंदादिली से जिंदगी का साथ निभाने वाले सदाबहार अभिनेता देव आनंद का जिंदगी ने साथ छोड़ दिया। सदाबहार अभिनेता, फिल्म निर्माता और निर्देशक देव आनंद का शनिवार रात लंदन में हृदय गति रूकने से निधन हो गया। वे 88 वर्ष के थे। रविवार की सुबह उनके देहांत की खबर सुनते ही बॉलीवुड और उनके प्रशंसकों के बीच शोक की लहर दौड़ गई।

पद्मभूषण और दादा साहब फाल्के पुरस्कार से सम्मानित देव आनंद ने अपने फिल्मी कैरियर की शुरूआत सन 1946 में प्रभात टॉकीज की फिल्म हम एक हैं से की। यह फिल्म बहुत सफल नहीं हो पाई। इसी फिल्म की शूटिंग के दौरान उनकी दोस्ती अपने जमाने के सुपर स्टार गुरूदत्त से हो गई। देव साहब को फिल्मी दुनिया में कामयाबी के लिए बहुत इंतजार नहीं करना पड़ा। बॉम्बे टॉकीज की 1947 में रिलीज  फिल्म जिद्दी में उन्हें मुख्य भूमिका प्राप्त हुई यह फिल्म एक सफल फिल्म साबित हुई। जिद्दी की सफलता के बाद देव साहब ने फिर पीछे मुड़कर नहीं देखा।

सन 1949 में देव आनंद ने नवकेतन के नाम से अपनी एक फिल्म कंपनी बनाई और देव साहब फिल्म निर्माता बन गए। देव आनंद साहब ने अपने मित्र गुरूदत्त का डायरेक्टर के रूप में सहयोग लिया और बाजी फिल्म बनाई जो सन 1951 में रिलीज हुई। इस फिल्म को अपार सफलता प्राप्त हुई, बाजी देव साहब के फिल्मी कैरियर में मील का पत्थर साबित हुई जिसकी सफलता ने उन्हें हिंदी सिनेमा का सुपरस्टार बना दिया।

इसके बाद उनकी कुछ और सफल फिल्में आईं जिनमें राही और आंधियां प्रमुख फिल्में थीं। इसके बाद आई टैक्सी ड्राइवर जो बहुत सफल फिल्म साबित हुई, इस फिल्म में उनके साथ मुख्य भूमिका में थीं कल्पना कार्तिक जिनसे आगे चलकर उनका विवाह हो गया। यह वह समय था जब फिल्मी दुनिया के शोमैन कहे जाने वाले राजकपूर अपने कैरियर की ऊंचाईयों पर थे। राजकपूर के सामने अपने को स्थापित कर पाना बहुत मुश्किल था, लेकिन देव आनंद ने एक अभिनेता रूप में खुद को स्थापित ही नहीं किया बल्कि सुपर स्टार बन गए।

इसके बाद उनकी लगातार कई हिट फिल्में रिलीज हुईं जैसे- मुनीम जी, सीआईडी, पेइंग गेस्ट, इंसानियत औरकाला पानी जिनको उस समय की सफलतम फिल्मों में शुमार किया जाता है। फिल्म काला पानी के लिए देव साहब को सर्वश्रेष्ठ अभिनेता के लिए फिल्म फेयर पुरस्कार से नवाजा गया। इसके बाद उनके जीवन में उस समय की मशहूर अभिनेत्री सुरैय्या का आगमन हुआ जो देव साहब से विवाह करना चाहती थीं। सुरैय्या की दादी धार्मिक कारणों से इस रिश्ते के खिलाफ थीं, कहा जाता है कि देव साहब से शादी न हो पाने के कारण सुरैय्या आजीवन अविवाहित ही रहीं। देव साहब ने सुरैय्या और अपने रिश्ते के बारे में सन 2007 में लोकार्पित हुई अपनी आत्मकथा रोमासिंग विद लाइफ में भी स्वीकार किया है।

रंगीन फिल्मों की बात की जाए तो देव साहब की पहली रंगीन फिल्म सन 1965 में रिलीज हुई गाइड थी, जिसने सफलता के नए आयाम स्थापित किए। आर. के. नारायणन के उपन्यास पर आधारित फिल्म गाइड के बारे में कहा जाता है कि अब दुबारा गाइड कभी नहीं बन सकती, ऐसी फिल्में एक बार ही बनती हैं। इसके बाद उनकी कई सफल फिल्में आईं जो हिंदी सिनेमा की सफल फिल्मों में शुमार की जाती हैं जैसे- ज्वेल थीफ, जॉनी मेरा नाम, हरे राम हरे कृष्णा, देस परदेस आदि।

देव आनंद साहब की फिल्मों को उनके बेहतरीन संगीत की वजह से भी याद किया जाता है। उनकी सभी फिल्मों का संगीत अपने समय में हिट साबित हुआ। उनकी हिट फिल्में और बेहतरीन संगीत सदा हमारे बीच उनकी यादों के रूप में रहेगा। भारतीय सिनेमा में अभिनेता के रूप में अपनी अलग पहचान बनाने वाले सुपरस्टार अभिनेता और एक जिंदादिल इंसान देव साहब का देहांत सिनेप्रमियों को आहत करने वाला है। उनकी ही फिल्म हम दो के सदाबहार गाने के इन शब्दों के साथ देव साहब को श्रद्धांजलि।

अभी न जाओ छोड़कर कि दिल अभी भरा नहीं…

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