पूर्व न्यायाधीश और भारतीय प्रेस परिषद के वर्तमान अध्यक्ष मार्कंडेय काटजू ने मीडिया को भी लोकपाल के दायरे में लाए जाने की राय व्यक्त की है। काटजू के इस बयान को लेकर मीडिया में हलचल है, लोकपाल के दायरे में लाए जाने का कुछ लोग विरोध कर रहे हैं तो कुछ समर्थन। मार्कंडेय काटजू की टिप्पणी मीडिया की स्वनियंत्रण की दलील के परिप्रेक्ष्य में है। काटजू ने कहा कि ‘‘सेल्फ रेगुलेशन कोई रेगुलेशन नहीं है और न्यूज ऑर्गनाईजेशन प्राइवेट संस्थान हैं जिनके काम का लोगों पर गहरा असर होता है, उन्हें जनता के प्रति जवाबदेह होना चाहिए।“

इससे पहले काटजू पत्र के माध्यम से (ब्राडकास्ट एडिटर्स एसोसिएशन) के सचिव एन.के सिंह से भी यह सवाल कर चुके हैं कि क्या न्यूज ब्राडकास्टर लोकपाल के दायरे में आना चाहते हैं। उन्होंने कहा- ‘‘मैं जानना चाहता हूं कि ब्राडकास्ट एडिटर्स एसोसिएशन, जिसके आप सचिव हैं लोकपाल के दायरे में आना चाहते हैं, जिसके संसद के अगले सत्र में पारित होने की संभावना है? ऐसा लगता है कि आप प्रेस काउंसिल आफ इंडिया के दायरे में आने से कतरा रहे हैं तो क्या आप लोकपाल के दायरे में भी नहीं आना चाहते हैं।‘‘ काटजू ने मीडिया की स्वनियंत्रण के अधिकार पर हमला करते हुए कहा कि ‘‘आप स्वनियंत्रण के अधिकार की मांग करते हैं। क्या आपको याद दिलाना पडे़गा कि इस तरह का निरंकुश अधिकार हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के जजों को भी हासिल नहीं है।

काटजू ने लिखा कि ‘‘वकील बार काउंसिल के नियंत्रण में हैं और किसी भी पेशेवर कदाचार के लिए उनके लाइसेंस को रद्द किया जा सकता है। इसी तरह, डाक्टरों पर मेडिकल काउंसिल की नजर होती है और चार्टर्ड अकाउंटेंट पर चार्टर्ड की… इत्यादि। फिर क्यों आपको लोकपाल या किसी भी दूसरी रेगुलेटरी अथारिटी के नियंत्रण में आने से एतराज है।“

काटजू ने लिखा कि ‘‘हाल ही में मीडिया ने अन्ना के आंदोलन का व्यापक प्रचार किया। अन्ना हजारे की भी यही तो मांग थी कि नेता, नौकरशाही एवं जजों सभी को जनलोकपाल के दायरे में लाया जाना चाहिए। आखिर किस आधार पर लोकपाल के दायरे में आने से छूट पाना चाहते हैं?‘‘

काटजू ने कड़ी टिप्पणी करते हुए लिखा कि ‘‘स्वनियंत्रण की दलील तो नेता और नौकरशाह आदि भी देंगे। कहीं आप खुद को ‘दूध के धुले‘ होने का दावा तो नहीं करते कि आप पर खुद के अलावा किसी का भी नियंत्रण न हो? यदि ऐसा है तो पेड न्यूज और राडिया टेप क्या था?‘‘

भारतीय प्रेस परिषद के अध्यक्ष की यह टिप्पणी कठोर जरूर है परंतु विचारपूर्ण भी है। हालांकि मीडिया जगत में उनकी इस टिप्पणी की कड़ी आलोचना भी हुई है, जैसा कि वरिष्ठ पत्रकार वेदप्रताप वैदिक ने उनकी टिप्पणी को ‘‘मीडिया पर नियंत्रण की अनियंत्रित सलाह‘‘ करार दिया। काटजू की यह सलाह व्यावहारिक रूप से मीडिया पर लागू करना उस पर अप्रत्यक्ष नियंत्रण कहा जा सकता है, परंतु मीडिया में भी एक ऐसा वर्ग उभर कर आया है जिस पर लोकपाल जैसी ही निगरानी किए जाने की आवश्यकता है।

मीडिया का वह वर्ग जो पैसे के आधार पर समाचार का समय और सामग्री तय करने का कार्य करता है। वह समाचारपत्र और समाचार चैनल जहां प्रशिक्षण के नाम पर नवोदित पत्रकारों का शोषण और उनसे पैसे लेकर पत्रकार बनाने का दावा किया जाता है, उन पर भी लोकपाल अथवा ऐसे ही किसी व्यवस्था की आवश्यकता जान पड़ती है। दरअसल, मीडिया में नियामक व्यवस्था लागू करने में मीडिया के विभिन्न पहलुओं पर विचार करना आवश्यक है।

मीडिया में समाचारों के प्रसारण के संबंध में हस्तक्षेप करना उचित नहीं जान पड़ता है परंतु मीडिया संगठनों के आर्थिक स्त्रोतों और उसकी कार्यप्रणाली की निगरानी की व्यवस्था करना आवश्यक प्रतीत होता है। जिससे मीडिया के कार्यव्यवहार में स्वतः ही सुधार दिखाई देने लगेगा परंतु मीडिया के समाचार प्रसारण पर नियंत्रण से अभिव्यक्ति की संवैधानिक स्वतंत्रता का ही हनन होगा। यह भी ध्यान देने योग्य है कि दर्शकों एवं पाठकों ने भी अब जागरूकता प्रदर्शित करनी शुरू की है, सनसनीखेज और टीआरपी की पत्रकारिता को जनता ने नकारना शुरू कर दिया है।

अगर बात रही पत्रकारों को प्राप्त किसी विशेषाधिकार की तो उसे व्यक्तिगत तौर पर  कोई भी विशेषाधिकार प्राप्त नहीं है, उसके ऊपर वो सभी कानून लागू होते हैं जो किसी आम आदमी पर। फिर भी मीडिया में बढ़ते भ्रष्टाचार और अनैतिक पत्रकारिता के जिम्मेदार लोगों के लिए काटजू की टिप्पणी सटीक जान पड़ती है।

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