पत्रकारिता और बाजार वर्तमान समय में एक दूसरे के पूरक जान पड़ते हैं। मीडिया उन्हीं घटनाओं और मुद्दों को कवर करता है, जिनका मीडिया के बाजार से सरोकार होता है। देश व समाज की मूल समस्याओं से मीडिया अपना जुड़ाव महसूस नहीं करता है, बल्कि वह उन बातों को अधिक तवज्जो देता है जो उसके मध्यमवर्गीय उपभोक्ता वर्ग का मनोरंजन कर सकें। इसका कारण यह है कि मध्यम वर्गीय उपभोक्ता वर्ग को अपने बाजार हित के लिए साधना ही मीडिया का उद्देश्य बन गया है। मीडिया कारोबारी अब समाचार चैनलों और पत्रों का प्रयोग जनचेतना अथवा जनशिक्षण के लिए नहीं बल्कि अपने आर्थिक हित के लिए करने लगे हैं। इस प्रसंग में पत्रकार प्रवर गणेश शंकर विद्यार्थी जी की निम्न पंक्तियां दृष्टव्य हैं-
‘‘यहां भी अब बहुत से समाचार पत्र सर्व-साधारण के लिए नहीं रहे, सर्वसाधारण उनके प्रयोग की वस्तु बनते जा रहे हैं। एक समय था, इस देश में साधारण आदमी सर्व-साधारण के हितार्थ एक ऊंचा भाव लेकर पत्र निकालता था, और उस पत्र को जीवन क्षेत्र में स्थान मिल जाया करता था। आज वैसा नहीं हो सकता। इस देश में भी समाचार पत्रों का आधार धन हो रहा है। धन से ही वे निकलते हैं और धन ही के आधार पर वे चलते हैं और बड़ी वेदना के साथ कहना पड़ता है कि उनमें काम करने वाले बहुत से पत्रकार भी धन ही की अभ्यर्थना करते हैं। अभी यहां पूरा अंधकार नहीं हुआ है, किंतु लक्षण वैसे ही हैं: कुछ ही समय पश्चात यहां के समाचार पत्र भी मशीन के सदृश हो जाएंगे, और उनमें काम करने वाले पत्रकार केवल मशीन के पुर्जे/व्यक्तित्व न रहेगा, सत्य और असत्य का अंतर न रहेगा, अन्याय के विरूद्ध डट जाने और न्याय के लिए आफतों को बुलाने की चाह न रहेगी, रह जाएगा केवल खिंची हुई लकीर पर चलना। ऐसे बड़े होने की अपेक्षा छोटे और छोटे से भी छोटे, किंतु कुछ सिद्धांतों वाला होना कहीं अच्छा।‘‘

गणेश शंकर विद्यार्थी पत्रकार को सत्य का पहरूआ मानते थे। उनके अनुसार सत्य प्रकाशित करना और उसे उजागर करना ही पत्रकार का धर्म होता है। उन्होंने कहा था-

‘‘मैं पत्रकार को सत्य का प्रहरी मानता हूं-सत्य को प्रकाशित करने के लिए वह मोमबत्ती की भांति जलता है। सत्य के साथ उसका वही नाता है जो एक पतिव्रता नारी का पति के साथ रहता है। पतिव्रता पति के शव साथ शहीद हो जाती है और पत्रकार सत्य के शव के साथ।‘‘
पत्रकार शिरोमणि गणेश शंकर विद्यार्थी ने पत्रकारिता को समस्त मानव जाति के कल्याण के लिए कार्य करने की प्रेरणा दी। उन्होंने कहा कि-
‘‘समस्त मानव जाति का कल्याण हमारा परम उद्देश्य है और इस उद्देश्य की प्राप्ति का एक बहुत जरूरी साधन हम भारतवर्ष की उन्नति समझते हैं।‘‘

पत्रकारिता के इस दौर में पत्रों एवं समाचार चैनलों पर यह आरोप आम हो चुका है कि मीडिया पाठकों एवं दर्शकों की रूचि का नहीं बल्कि बाजार का ख्याल रखता है। विद्यार्थी जी के जीवनी लेखक देवव्रत शास्त्री ने उनकी पंक्तियों को दोहराते हुए लिखा है-
‘‘हमारे पाठक कैसे हैं, उन्हें कैसी पाठ्य सामग्री पसंद है, कैसी सामग्री उनके लिए फायदेमंद है। इस बात का ख्याल अधिकतर पत्र वाले नहीं रखते, परंतु प्रताप में इसका ख्याल रखा जाता था। विद्यार्थी जी सदा अपने सहकारियों को इसके लिए समझाते थे। वे इस बात का भी बहुत ख्याल रखते थे कि पाठकों की रूचि के अनुसार पाठ्य सामग्री तो जरूर दी जाए, परंतु कुरूचिपूर्ण न हो।‘‘

विद्यार्थी जी युवा पत्रकारों के लिए उनके शिक्षक के समान थे, उनके संपर्क में आकर बहुत से पत्रकारों ने पत्रकारिता में अग्रणी स्थान प्राप्त किया। वे उन्हें भली-भांति समझाते थे, एक बार वे कार्यालय में आए और अखबार उठाते हुए पूछने लगे ‘‘कोई नई बात है? यह उत्तर मिलने पर कि अभी देखा नहीं, कहने लगे, कैसे जर्नलिस्ट हो तुम लोग? नया पत्र आकर रखा हुआ है और उसी दम उठाकर देखने की इच्छा नहीं हुई?‘‘ विद्यार्थी जी की फटकार सुनकर सभी अपना सिर नीचा कर लेते।

गणेश विद्यार्थी ने अपनी पत्रकारिता के माध्यम से हिंदी को भी नए तेवर देने का कार्य किया। उनका पत्र ‘‘प्रताप‘‘ तत्कालीन समय का लोकप्रिय पत्र था, वे हिंदी के प्रचार-प्रसार के लिए सदा चिंतित रहे। हिंदी को वे जन-जन की भाषा बनाने का स्वप्न देखते थे। अखिल भारतीय हिन्दी सम्मेलन, गोरखपुर (1929) के अध्यक्षीय भाषण में गणेश जी ने कहा-

‘‘हिन्दी के प्रचार का सबसे बड़ा साधन है हिन्दी प्रांतों में लोक शिक्षा को आवश्यक और अनिवार्य बना देना। कोई ऐसा घर न रहे, जिसके नर नारी, बच्चे बूढ़े तक तुलसीकृत रामायण, साधारण पुस्तकें और समाचार पत्र न पढ़ सकें। यह काम उतना कठिन नहीं है, जितना कि समझा जाता है। यदि टरकी में कमाल पासा बूढ़ों और बच्चों तक को साक्षर कर सकते हैं और सोवियत शासन दस वर्षों के भीतर रूस में अविद्या का दीवाला निकाल सकता है, तो इस देश में सारी शक्तियां जुटकर बहुत थोड़े समय में अविद्या के अंधकार का नाश कर प्रत्येक व्यक्ति को पढ़ने और लिखने योग्य बना सकती है।”

गणेश शंकर विद्यार्थी सदा पत्रकारिता के कार्य में एक मोमबत्ती की भांति जलते रहे। उनका जीवन पूर्णतया पत्रकारिता को समर्पित था। विद्यार्थी जी एक पत्रकार ही नहीं क्रांतिकारियों के प्रबल समर्थक थे, वे क्रांतिकारियों को लेकर गांधी जी की आलोचना को भी पसंद नहीं करते थे। उनकी पत्रकारिता पूर्णतया भारत की स्वतंत्रता के ध्येय को लेकर समर्पित थी जिससे उन्होंने कभी समझौता नहीं किया। वर्तमान समय में जब पत्रकारिता अपने उद्देश्यों से भटक गई है, गणेश शंकर विद्यार्थी जैसे ध्येय समर्पित पत्रकार हमारे लिए प्रेरणास्त्रोत हैं। जिनका हमें पत्रकारिता के नैतिक पथ पर चलते हुए स्मरण अवश्य करना चाहिए।

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