भारत में पत्रकारिता का प्रादुर्भाव पुनर्जागरण के समय में हुआ था। यही वह समय था जब भारत की राष्ट्रीय चेतना जागृत हो रही थी। राष्ट्र की चेतना को जागृत करने वाले सभी प्रमुख लोगों ने इस कार्य के लिए पत्रकारिता को अपना सशक्त माध्यम बनाया। पत्रकारिता उस दौर में ब्रिटिश साम्राज्य के विरूद्ध जनमत निर्माण के माध्यम के रूप में सामने आई थी। इस माध्यम का उपयोग स्वाधीनता आंदोलन के प्रमुख नायक महात्मा गांधी ने भी किया था। 2 अक्टूबर, 1869 को गुजरात के पोरबंदर में जन्मे मोहनदास करमचंद गांधी ने स्वाधीनता आंदोलन को पत्रकारिता के माध्यम से मजबूती प्रदान की। महात्मा गांधी ने अपनी पत्रकारिता की शुरूआत सन 1888 में लंदन से ही कर दी थी। गांधी जी ने पत्रकारिता का उपयोग दो प्रकार से किया- इंग्लैण्ड में प्रवास काल (जुलाई, 1888-जून,1891) तथा दक्षिण अफ्रीका में देशी-विदेशी समाचारपत्रों के माध्यम से गांधी ने अपने कार्यों एवं विचारों को पाठकों तक पहुंचाने का कार्य किया और उन्हें वहां के समाचारपत्रों में विशेष स्थान मिलता गया। गांधी जी ने पत्रकारिता के माध्यम से दक्षिण अफ्रीका से लेकर भारत तक में भारत और भारतीयों के अधिकारों के लिए आवाज उठाई। सन् 1888 से 1896 तक का समय गांधी जी के पत्रकारिता के संपर्क में आने का समय कहा जा सकता है।
महात्मा गांधी जब सन् 1888 में लंदन पहुंचे तब तक वे समाचारपत्रों की दुनिया से अधिक परिचित नहीं थे, दलपतराम शुक्ल के सुझाव पर उन्होंने प्रतिदिन एक घंटे का समय विभिन्न अखबारों को पढ़ने में लगाना शुरू किया। तब उनके मन में यह विचार आया भी न होगा कि वे एक दिन समाचार पत्रों की दुनिया के महत्वपूर्ण व्यक्ति के रूप में स्थापित होंगे। गांधी जी अपनी माता के प्रभाव के कारण अन्नाहारी थे, वे इंग्लैण्ड में अन्नाहार आंदोलन से भी जुड़े रहे थे। अन्नाहार को लेकर गांधी जी ने ब्रिटेन के प्रतिष्ठित अखबार ‘‘वेजिटेरियन‘‘ में लेख लिखना शुरू किया। ब्रिटेन के बाद दक्षिण अफ्रीका पहुंचने पर महात्मा गांधी ने ‘‘इंडियन ओपीनियन‘‘ समाचार पत्र का संपादन किया। उन्होंने इंडियन ओपीनियन के माध्यम से दक्षिण अफ्रीकी और भारतीय लोगों को ब्रिटिश साम्राज्य के प्रति जागृत करने का कार्य किया। ‘‘इंडियन ओपीनियन‘‘ का प्रथम अंक 4 जून, 1903 को निकला, जिसमें महात्मा गांधी ने पत्रकारिता के उद्देश्यों को स्पष्ट करते हुए लिखा-

1- ‘‘पत्रकारिता का पहला काम जनभावनाओं को समझना और उन्हें अभिव्यक्ति देना है।
2- ‘‘पत्रकारिता का दूसरा उद्देश्य लोगों में जरूरी भावनाओं को जागृत करना है।
3- ‘‘पत्रकारिता का तीसरा उद्देश्य निर्भीक तरीके से गड़बड़ियों को उजागर करना है।
गाँधी जी ने आर्थिक समस्या और सरकारी दबाव के बाद भी इंडियन ओपीनियन का प्रकाषन जारी रखा। गोपाल कृष्ण गोखले को 25 अप्रैल, 1909 को प्रेषित पत्र में उन्होंने लिखा-
‘‘20 अप्रैल तक ‘इंडियन ओपीनियन‘ पर 2500 पौंड का कर्ज था। पर संघर्ष की खातिर मैं उसे चलाए जा रहा हूं।‘‘

महात्मा गांधी अल्पायु में ही समाचार पत्रों के लिए महत्वपूर्ण व्यक्ति बन गए। समाचार पत्रों में लेखन के माध्यम से महात्मा गांधी समूचे दक्षिण अफ्रीका में लोकप्रिय हो गए थे। गांधी जी ने पत्रकारिता को अपने संघर्ष का सशक्त माध्यम बना लिया और पत्रकारिता जगत के आवश्यक अंग बन गए। महात्मा गांधी ने भारत लौटकर भी पत्रकारिता के अपने सफर को जारी रखा। भारत लौटने पर उन्होंने ‘‘बॉम्बे क्रॉनिकल‘‘ और सत्याग्रही समाचार पत्र निकाले, किंतु वे 10-15 दिनों तक ही इनका दायित्व संभाल सके। इन समाचार पत्रों के बंद होने के बाद महात्मा गांधी ने ‘‘नवजीवन‘‘ और ‘‘यंग इंडिया‘‘ दो समाचार पत्र सितंबर 1919 में निकाले, जिनका प्रकाशन सन् 1932 में गांधी जी की गिरफ्तारी के बाद बंद हो गए। इसके बाद भी महात्मा गांधी के पत्रकार जीवन की यात्रा जारी रही। जेल से छूटने के पश्चात् गांधी जी ने ‘‘हरिजन‘‘ नामक साप्ताहिक समाचार पत्र निकाला, जिसका प्रकाशन 11 फरवरी, 1933 से प्रारंभ होकर महात्मा गांधी के जीवन-पर्यंत तक जारी रहा। गांधी जी के अपने समाचार पत्रों का प्रकाशन कई बार बंद करना पड़ा, लेकिन वे ब्रिटिश सरकार की कुटिल नीतियों के आगे न कभी झुके, न थके। गिरफ्तारी और सेंसरशिप लगने से उनके पत्र बंद अवश्य हुए, लेकिन मौका मिलते ही गांधी जी पुनः पत्रों के प्रकाशन के कार्य में जुट जाते थे। गांधी जी ने कई दशकों तक पत्रकार के रूप में कार्य किया, कई समाचारपत्रों का संपादन किया। महात्मा गांधी ने उस समय में जब भारत में पत्रकारिता अपने शैशव काल में थी, उन्होंने पत्रकारिता की नैतिक अवधारणा प्रस्तुत की। महात्मा गांधी ने जिन समाचार पत्रों का प्रकाशन अथवा संपादन किया वे पत्र अपने समय में सर्वाधिक लोकप्रिय पत्रों में माने गए। गांधी जी के पत्रकारिता की प्रशंसा करते हुए चेलापतिराव ने कहा कि- ‘‘गांधी जी शायद सबसे महान पत्रकार हुए हैं और उन्होंने जिन साप्ताहिकों को चलाया और संपादित किया वे संभवतः संसार के सर्वश्रेष्ठ साप्ताहिक हैं।‘‘

महात्मा गांधी समाचार पत्रों को किसी भी आंदोलन अथवा सत्याग्रह का आधार मानते थे, उन्होंने कहा था- ‘‘मेरा ख्याल है कि ऐसी कोई भी लड़ाई जिसका आधार आत्मबल हो, अखबार की सहायता के बिना नहीं चलायी जा सकती। अगर मैंने अखबार निकालकर दक्षिण अफ्रीका में बसी हुई भारतीय जमात को उसकी स्थिति न समझाई होती और सारी दुनिया में फैले हुए भारतीयों को दक्षिण अफ्रीका में कया कुछ हो रहा है, इसे इंडियन ओपीनियन के सहारे अवगत न कराया होता तो मैं अपने उद्देश्य में सफल नहीं हो सकता था। इस तरह मुझे भरोसा हो गया है कि अहिंसक उपायों से सत्य की विजय के लिए अखबार एक बहुत ही महत्वपूर्ण और अनिवार्य साधन है।‘‘
महात्मा गांधी ने पत्रकारिता के माध्यम से सूचना ही नहीं बल्कि जनशिक्षण और जनमत निर्माण का भी कार्य किया। गांधी जी की पत्रकारिता पराधीन भारत की आवाज थी, उन्होंने समाचार पत्रों के माध्यम से अपनी आवाज को जन-जन तक पहुंचाया और अंग्रेजों के विरूद्ध जनजागरण का कार्य किया।

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