भारत की इस पुण्यभूमि पर विभिन्न धर्मों एवं मतों का उद्भव हुआ,जो कि समस्त विश्व में प्रसारित-प्रचारित हुए हैं. इनमें से ही एक है,बौद्ध मत जिसके अनुयायी संसार के लगभग सभी देशों में हैं. बौद्ध मत का उद्भव प्राचीन भारत के मगध राज्य में हुआ था. जहाँ से बौद्धमत पल्लवित होता हुआ समस्त संसार में प्रसारित हुआ. भारत से बाहर बौद्धमत ने श्रीलंका, चीन, कम्बोडिया, मंगोलिया, इंडोनेशिया,थाईलैंड, जापान, भूटान, विएतनाम, कोरिया आदि  देशों में अपनी जड़ें जमाई. बौद्ध मत का प्रसार एशिया ही नहीं पश्चिमी देशों में भी हुआ. भौतिकतावादी संस्कृति से दूर बौद्धमत कि अध्यात्मिक मान्यताओं ने पश्चिमी देशों के लोगों को विशेष तौर पर आकर्षित किया है. आज हम बात करेंगे ऑस्ट्रेलिया की जहाँ पर पर बौद्धमत, ईसाई मत के बाद दूसरा सबसे तेजी से प्रसारित होने वाला सम्प्रदाय है.
                            सन १८४८ में बौद्धमत के कुछ अनुयायी चीन से ऑस्ट्रेलिया पहुंचे थे, जिन्होनें दक्षिणी मेलबर्न में विशाल बौद्ध मंदिर का निर्माण भी करवाया था. बौद्धमत के अनुयायियों का इससे भी बड़ा जत्था सन १८६७ में जापान से पहुंचा था, जिनकी संख्या ३६०० थी. जापानी बौद्धों ने उत्तरी ऑस्ट्रेलिया के थर्सडे आईलैंड को अपना ठिकाना बनाया. इसके बाद श्रीलंका के सिंहली बौद्ध भी सन 1870ऑस्ट्रेलिया आ पहुंचे, जिन्होनें गन्ना मिलों में काम किया. १९वीं सदी के अंत तक ऑस्ट्रेलिया में बौद्ध लोगों की तादाद काफी बढ़ चुकी थी. लेकिन २०वीं  सदी के प्रारंभ में ऑस्ट्रेलिया की श्वेत ऑस्ट्रेलियन नीति के कारण बौद्ध मतानुयायियों को वहां से पलायन करना पड़ा. जिसके बाद सन १८९१ में बौद्धमत एक बार फिर ऑस्ट्रेलिया वापस लौटा. जब अमेरिकन बौद्ध हेनरी स्टील ऑस्ट्रेलिया आये और थियोसोफिकल सोसाइटी की स्थापना की, ऑस्ट्रेलिया के उच्चवर्गीय लोगों में इस दौरान बौद्ध मत का काफी प्रभाव बढ़ा. सन १९१० में पहले बौद्ध भिक्षु  सासन धजा बर्मा से ऑस्ट्रेलिया पहुंचे,जिसके बाद एशिया के विभिन्न देशों से बौद्ध भिक्षु ऑस्ट्रेलिया पहुंचे. सन १९५३ में ऑस्ट्रेलिया में ”बुद्धिस्ट सोसाइटी ऑफ़ विक्टोरिया” का गठन हुआ और सन १९५६ में “बुद्धिस्ट सोसाइटी ऑफ़ न्यू साउथ वेल्स” का गठन हुआ.
                   सन १९७० में वियतनाम युद्ध के दौरान दक्षिण पूर्व एशिया से बड़ी संख्या में बौद्ध लोग ऑस्ट्रेलिया पहुंचे. ऑस्ट्रेलिया में तिब्बती बौद्ध लोगों का प्रादुर्भाव सन १९७४ में हुआ, तिब्बती बौद्धों ने ऑस्ट्रेलिया में अपने २५ केंद्र स्थापित किये हैं. तिब्बती बौद्ध लोगों ने मेलबर्न के नजदीक बेन्दिगो नामक स्थान पर एक स्तूप का निर्माण करवाया है, जो समस्त विश्व को भारतीय संस्कृति के मूल सन्देश “वसुधैव कुटुम्बकम” का परिचय देता है. इस स्तूप का शिलान्यास भारत में निर्वासित जीवन जी रहे बौद्ध धर्मगुरु दलाई लामा ने ७ जून, सन २००७ को किया. इस स्तूप का व्यास ४८ मी. है और ऊंचाई ५० मी. है. सन २००७ में ऑस्ट्रेलिया पहुंचे दलाई लामा को ऑस्ट्रलियाई लोगों ने सिर आँखों पर बिठाया. ऑस्ट्रलियाई लोगों का कहना था कि “हमने ईसा को नहीं देखा, भगवान बौद्ध को नहीं देखा, लेकिन हमारे बीच साक्षात् भगवान रूप में आये दलाई लामा के दर्शन हमें अवश्य करने चाहिए”.  सन २००६ की जनगणना के आंकड़ों के अनुसार बौद्धमत के लोगों की संख्या ऑस्ट्रेलिया में ईसाई लोगों के बाद दूसरे स्थान पर है. बौद्ध लोगों की संख्या का प्रतिशत ऑस्ट्रेलिया में २.१ प्रतिशत है. बौद्धमत वर्तमान दौर में ऑस्ट्रेलिया में सबसे तेजी से बढ़ता हुआ दूसरा धर्म है. भारत के मगध राज्य में पल्लवित हुए बौद्धमत ने भारतीय संस्कृति का एशिया के ही नहीं पश्चिमी के देशों में भी प्रचार किया है.
              वर्तमान समय में जब नैतिक मूल्यों का ह्रास हो रह है,भौतिकतावाद ने समस्त जीवन पद्धति को दुष्प्रभावित किया है. ऐसे समय में बौद्धमत प्रासंगिक और अनुकरणीय है, एशिया ही नहीं पश्चिम के राष्ट्रों ने भी भली-भांति समझने का प्रयास किया है. भौतिक संसाधनों के अत्यधिक उपभोग में लिप्त व्यक्ति को बौद्ध मत में “तनहा” की संज्ञा दी गयी है. “तनहा” की अवस्था में ही मनुष्य सामाजिक समरसता को छोड़ कर भटकाव की ओर अग्रसर हो जाता है. बौद्धमत ने समाज के लिए तर्क तथा सहिष्णुता को प्रमुख आवश्यकता बताया है. बौद्धमत ने समाज में सभी विभेदों को नकारते हुए समस्त विश्व को समतामूलक समाज की अवधारणा दी है. भूमंडलीकरण के वर्तमान दौर में साम्राज्यवादी देशों द्वारा विकासशील देशों को काबू में रखने के षड्यंत्रों का भी बौद्ध मत ने निदान सुझाया है. बौद्ध मतानुसार यदि विकासशील देश अपनी भौतिकता को त्याग दें, तो भौतिकता   में आकंठ डूबे साम्राज्यवादी देश उन पर अपना प्रभुत्व नहीं जमा सकते हैं.
              भारतीय संस्कृति को विश्व भर में प्रसारित करने में बौद्ध मत ने महती भूमिका निभायी है. बौद्धमत के विचार, परंपरा तथा जीवन दर्शन समस्त एशिया महाद्वीप में तो फैले ही साथ ही समस्त संसार में सामाजिक सहिष्णुता और समरसता का सन्देश प्रसारित किया. भारत में बौद्ध धर्म के विषय में बात करें तो महान सम्राट अशोक ने तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व में नौ धर्म प्रचारकों की मंडली को विश्व के अनेक भागों में बौद्ध मत का प्रचार करने के लिए भेजा. जिन्होनें ने दक्षिण और दक्षिण पूर्व एशिया के देशों में भारतीय संस्कृति और दर्शन का प्रचार-प्रसार किया. समस्त विश्व में लोकप्रिय “लॉफिंग बुद्धा” और चीनी व्यायाम कला आदि भी बौद्ध मत की समस्त संसार को अमूल्य देन हैं. इसी इतिहास के कारण आज भी चीनी लोग भारत को बहुत सम्मान देते हैं. अंततः हम कह सकते हैं की भारतीय संस्कृति के अंग बौद्ध मत ने भारतीय संस्कृति से समस्त विश्व का परिचय कराने में महती भूमिका निभायी है.

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