किसी भी समाज की जीवंतता का परिचय उसकी लोकसंस्कृति से होता है। कवियों, लेखकों, दार्शनिकों समेत कई चरित्र हर लोकसंस्कृति में इतने गहरे रचे-बसे होते हैं कि उन्हें जीवन के प्रवाह से अलग करके नहीं देखा जा सकता। भारत में हिंदी क्षेत्र की बात करें तो महाकवि तुलसीदास, कबीरदास और मलूकदास से लेकर महाकवि घाघ तक की ऐसी समृद्ध परंपरा है, जो हमारे दैनिक जीवन का इस कदर हिस्सा हैं कि इन्हें हम खुद से अलग महसूस नहीं करते। महाकवि घाघ की बात करें तो वह किसी एक रचना के माध्यम से नहीं जाने जाते बल्कि उनकी कहावतें आम ग्रामीण जीवन का इस तरह से हिस्सा हैं कि पीढ़ियों से वे प्रवाहित होती आई हैं।

महाकवि घाघ के बारे में कहा जाता है कि वह 1750 ई. के आसपास पैदा हुए थे। जन्मतिथि की तरह ही उनके जन्मस्थान को लेकर भी विवाद है। अलग-अलग लेखकों और विद्वानों ने उन्हें बिहार के छपरा से लेकर उत्तर प्रदेश के गोंडा और कन्नौज तक का निवासी साबित करने का प्रयास किया है। हालांकि, उनकी कहावतें काफी हद तक अवधी अंचल की प्रतीत होती हैं, ऐसे में इस बात की प्रबल संभावना है कि वह गोंडा या फिर अवध क्षेत्र के ही किसी हिस्से के निवासी रहे होंगे।

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घाघ की कहावतें या लोकोक्तियां इतनी लोकप्रिय हैं कि आज भी लोग किसी वाचाल व्यक्ति को ‘घाघ’ की उपमा दे देते हैं। ‘फलां व्यक्ति बहुत घाघ है, उससे पार नहीं पाया जा सकता।’ अक्सर हम इस प्रकार की बातें किसी शख्स के लिए कह देते हैं लेकिन हम लोगों में से ऐसे तमाम हैं, जो घाघ के बारे में जानते भी नहीं कि आखिर वह कौन थे।

हिंदी भाषी क्षेत्र में उनकी कृषि, स्वास्थ्य और लोक व्यवहार से जुड़ी कहावतें लोग पूरे अधिकार से कहते हैं। खासतौर पर कृषि को लेकर महाकवि घाघ की कहावतें एक तरह से भविष्यवाणियां थीं, जिन्हें खेतिहर आज भी जोतने, बोने, सींचने और फसल काटने के लिहाज से महत्वपूर्ण मानते हैं। यही नहीं भले ही तत्कालीन समय में मौसम विज्ञान बहुत समृद्ध न रहा हो लेकिन घाघ की कहावतें उसके बदलाव को लेकर बेहद सटीक मालूम पड़ती हैं। मैंने स्वयं अपनी दादी से ऐसी तमाम लोकोक्तियों को सुना था तो लगता था कि आखिर कैसे वह निरक्षर होते हुए भी इतनी गूढ़ समझ रखती हैं। लोकसंस्कृति का अध्ययन करने पर मालूम पड़ा कि यह ज्ञान महाकवि घाघ से रिसते हुए दादी को अपनी दादी से दादा को अपने दादा से मिलता रहा और इस कालखंड तक आ पहुंचा।

आइए जानते हैं घाघ की खेती से जुड़ी 5 बेहद महत्वपूर्ण और सटीक लोकोक्तियों के बारे में:-

मघा के बरसे, माता के परसे।
भूखा न मांगे, फिर कुछ हरि से।।

अर्थात: माघ नक्षत्र की वर्षा सबसे लाभदायी होती है, जैसे माता के परोसे भोजन से पुत्र को तृप्ति मिलती है, वैसे ही माघ की बारिश से फसल अच्छी होती है। इसके बाद किसान या बेटे को भगवान से कुछ मागने की इच्छा नहीं रहती।

उत्तम खेती, मध्यम बान।
निषिद चाकरी, भीख निदान।।

अर्थात: खेती सबसे अच्छा कार्य है, कारोबार मध्यम है और नौकरी सबसे निकृष्ट। घाघ ने भीख को जीवन का अंतिम उपाय माना है।

एक हर हत्या, दो हर काज।
तीन हर खेती, चार हर राज।।

अर्थात: यदि किसान के पास एक हल खेती है तो हत्या के बराबर है। दो हल की खेती कामचलाऊ है और तीन या चार हल की खेती है तो राजा समान है।

जो हल जोतै खेती वाकी।
और नहीं तो जाकी-ताकी।।

अर्थात: जो किसान खुद हल जोतता है, खेती उसी की होती है अन्यथा बिखर जाती है।

अगहर खेती, अगहर मार।
घाघ कहै, कबहुं न हार।।

अर्थात: खेती और मारपीट के मामले में पहल करने वाला व्यक्ति मात नहीं खाता।

(नवभारत टाइम्स डॉट कॉम में प्रकाशित ब्लॉग)

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संजय लीला भंसाली की फिल्म ‘पद्मावत’ भारी विरोध के चलते तमाम कट लगने और नाम बदले जाने के बाद 25 जनवरी को रिलीज होने वाली है। भंसाली का कहना है कि उन्होंने मलिक मोहम्मद जायसी की रचना ‘पद्मावत’ के आधार पर यह फिल्म बनाई है। इसी वजह से विवाद को निपटाने की पहल करते हुए सेंसर बोर्ड ने मूवी का नाम भी पद्मावती की बजाय ‘पद्मावत’ ही करा दिया। यहां मैं इस फिल्म को लेकर विवाद पर नहीं बल्कि पद्मावत पर बात करूंगा। कालिदास के ‘मेघदूत’ के बाद मैं इसे बीते दौर की दूसरी सबसे उत्कृष्ट श्रृंगार रस की रचना मानता हूं। यह रचना श्रृंगार और वीर रस की गाथा कहने के साथ ही इतिहास की भी एक झलक देती है।

जायसी ने अपनी काव्य रचना में जहां रत्नसेन और पद्मावती के प्रेम और सौंदर्य की कहानी कही है, वहीं दिल्ली के बादशाह अलाउद्दीन खिलजी को खलनायक के तौर पर ही दिखाया है। हालांकि इस रचना पर मेरा अध्ययन कहता है कि भले ही खिलजी खलनायक हो, लेकिन रत्नसेन या पद्मावती भी असली नायक नहीं कहे जा सकते। इस पूरी रचना में असली नायक मुझे चित्तौड़ के राजपूत योद्धा गोरा और बादल जान पड़ते हैं। रत्नसेन को प्रेम में डूबे एक राजा के तौर पर दिखाया गया है, जो पद्मावती के रूप-सौंदर्य की एक तोते से कहानी सुनने के बाद चित्तौड़ राज्य को भूलकर जोगी बन सिंहल द्वीप चले जाते हैं। वहां कई बरस रहने के बाद वह पद्मावती संग लौटते हैं। वहीं, पद्मावती को ऐसी रूप सुंदरी बताया गया है, जिसकी दुनिया में दूसरी कोई मिसाल नहीं थी। सिंहल द्वीप से लेकर दिल्ली के बादशाह तक उसके रूप की चर्चा होती है।

रत्नसेन ने पद्मावती के प्रेम में जोगी बन प्यार की एक मिसाल पेश की थी, यह उन्हें सत्यवान-सावित्री, हीर-रांझा और रोमियो-जूलियट जैसे प्रेमियों की कतार में तो खड़ा करता है, लेकिन राजधर्म में वह श्रेष्ठ नहीं माने जा सकते। राजधर्म के प्रति उस शासक को ही श्रेष्ठ कहा जा सकता है, जो अपने व्यक्तिगत सुख पर राज्य के कर्तव्य को तरजीह दे, ऐसा रत्नसेन ने नहीं किया। रानी पद्मावती की बात करें तो राजा की युद्ध में मृत्यु के पश्चात जौहर करने के लिए उन्हें सम्मान दिया जाता है। ऐसा ही रत्नसेन की पहली पत्नी नागमति ने भी किया था। निश्चय ही खिलजी की रानी बनने की बजाय पद्मावती का जौहर करना बलिदान की एक श्रेष्ठ मिसाल है। लेकिन, राज्य के प्रति कर्तव्य की बात की जाए तो गोरा-बादल का बलिदान रत्नसेन और पद्मावती दोनों से श्रेष्ठ था।

राजा से नाराजगी फिर भी छुड़ाने चल दिए गोरा-बादल
हालांकि मैं रत्नसेन और पद्मावती की बजाय राजपूत योद्धाओं गोरा और बादल को चित्तौड़ और भारतीय समाज के लिए गौरव मानता हूं। इसकी वजह उनका प्रेम में अनुरक्त होना नहीं बल्कि राजधर्म के प्रति सर्वस्व न्योछावर करना है। ‘पद्मावत’ में ही ‘गोरा-बादल युद्ध गमन खंड’ में उनके अप्रतिम शौर्य और कर्तव्यनिष्ठा का वर्णन किया गया है। इन दोनों योद्धाओं ने खिलजी को चितौड़गढ़ में आमंत्रित करने और उससे दोस्ती के प्रति रत्नसेन को आगाह किया था। ऐसा करने पर दोनों नाराज हो गए थे। लेकिन, रत्नसेन के खिलजी की कैद में होने की बात जब दोनों ने पद्मावती से सुनी तो सब भूलकर राजधर्म के पालन में अपना लाव-लश्कर ले, दिल्ली कूच कर गए। पद्मावती के रत्नसेन से भेंट करने और फिर खिलजी की रानी बन जाने की चाल चलकर दोनों रत्नसेन को छुड़ा लाते हैं। इस जंग में गोरा राजधर्म का पालन करते हुए वीरगति को प्राप्त होता है, जबकि बादल संग रत्नसेन चित्तौड़ पहुंच जाते हैं। यह दोनों वीरों की अप्रतिम शौर्यगाथा थी।

महारानी के साथ गोरा-बादल को भी करें याद
पद्मावती-रत्नसेन और खिलजी के अलावा गोरा-बादल की इस वीरता को भंसाली ने फिल्म में किस प्रकार दिखाया है, इसमें मेरी दिलचस्पी होगी। पद्मावती की भूमिका से छेड़छाड़ के आरोप लगा विरोध कर रहे करणी सेना जैसे संगठनों को भी महारानी के साथ ही गोरा-बादल के बलिदान को भी याद रखना चाहिए, जिन्होंने राजा से नाराजगी के बाद भी राजधर्म के पालन के लिए अपने प्राण न्योछावर करने का फैसला लिया।

गौने के बाद आई प्रेयसी को छोड़ चल देता है बादल
एक तरफ जहां पद्मावती के प्रेम में रत्नसेन चित्तौड़ छोड़कर जोगी बन सिंहल द्वीप पहुंच जाते हैं, वहीं बादल गौने आई प्रेयसी को छोड़ राजा को छुड़ाने दिल्ली कूच कर जाते हैं। इस लिहाज से मैं रत्नसेन पर बादल की वीरता और कर्तव्यपरायणता को तरजीह देता हूं। युद्ध गमन से पहले गौने के बाद आई पत्नी से बादल किन शब्दों में विदा लेता है, वह वीर रस का अनुपम व्याख्यान है- ‘जब तक राजा छूटकर नहीं आता, तब तक मुझे वीर रस अच्छा लगता है, श्रृंगार नहीं। मैं प्राणों पर खेल जाऊंगा और स्वामी के लिए इंद्रासन को भी हटा दूंगा। पुरुषों के लिए जहां वीर रस उचित है, वहां श्रृंगार अच्छा नहीं लगता।’

(नवभारत टाइम्स डॉट कॉम के ब्लॉग में प्रकाशित)

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क्या चीन, पाकिस्तान या अन्य किसी बाहरी शक्ति से जंग में सेना का नेतृत्व किसी ब्राह्मण के हाथ होगा तो जनवादी भारत के विरोध में लड़ेंगे? आप पूछेंगे यह क्या बेहूदा सवाल है, लेकिन यह सवाल महाराष्ट्र के पुणे में हुए बेहूदा जश्न के चलते खड़ा हुआ है। गुजरात की एक सीट से हाल ही में विधायक चुने गए जिग्नेश मेवाणी और जेएनयू के पढ़े उमर खालिद यहां एक कार्यक्रम का नेतृत्व करने पहुंचे थे। यह कार्यक्रम 1818 में भीमा-कोरेगांव में पेशवा बाजीराव द्वितीय की सेना की अंग्रेजों से हार की 200वीं बरसी के जश्न के लिए आयोजित था।

इन जनवादियों का तर्क है कि इस युद्ध में अंग्रेजों की ओर से महार सैनिक लड़े थे और पेशवा हार गए थे तो यह ब्राह्मणवाद पर दलितों की जीत है। कप्तान फ्रांसिस स्टॉन्टन के नेतृत्व में ईस्ट इंडिया की कंपनी की टुकड़ी पेशवा-मराठा सैनिकों के खिलाफ लड़ी थी और 12 घंटे तक चले युद्ध में जीती थी। अंग्रेजी टुकड़ी में कुछ दलित भी थे, लेकिन यह न तो दलितों की जीत थी और न ब्राह्मणों की हार थी। उस जंग में हारा था तो सिर्फ भारत।

यह कड़वा सच है कि अंग्रेजी सेना में हमारे तमाम समुदायों के लोग शामिल हो गए थे। यहां तक कि 1857 की क्रांति का बिगुल फूंकने वाले मंगल पाण्डेय भी ब्रिटिश सेना के ही कारिंदे थे, लेकिन वह विद्रोह न करते तो शायद ही कोई उनके नाम को गर्व से लेता। आज भी बहुत से ऐसे लोग मिलते हैं, जिनके पूर्वज अंग्रेजी सेना में थे, लेकिन वे उनका नाम लेने में सकुचाते हैं। अब समझ लीजिए कि अंग्रेजों की चाकरी करने वाले अपने दादा और परदादा के नाम पर भी लोगों में संकोच है और आप हैं कि आप देश के हारने का जश्न मनाते हैं।

यदि महार सैनिकों के अंग्रेजों की तरफ से लड़ने और राष्ट्र से विश्वासघात करने पर जनवादी कहलाने वालों को खुद पर गर्व है तो यह समझना होगा कि वह किस स्तर तक गिरे हैं। देश से द्रोह करने पर गर्व करने के लिए सामान्य गिरावट काम नहीं आती, इसके लिए राष्ट्र के प्रति अपनी चेतना को गर्त में धकेलना पड़ता है। चलिए, आपकी चेतना इतनी गिर गई है तो इसमें दलित समाज को साझा न करिए। आपकी इस राष्ट्रविरोधी सोच से उस महार या दलित समाज का कोई सरोकार नहीं है, जिसने देश को आंबेडकर जैसी हस्ती दी है और जिसने आजादी की जंग से लेकर अब तक कंधे से कंधा मिलाकर काम किया है।

खैर, हमें दलित समाज के उन लोगों पर गर्व है, जिन्होंने देश और समाज की उन्नति में अमूल्य योगदान दिया। हमें तो बाबा साहेब भीमराव आंबेडकर, ज्योतिबा फुले, बिरसा मुंडा, और संत रविदास की परंपरा पर गर्व है और देश में यही परंपरा चलेगी।

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अमरनाथ यात्रा पर गए श्रद्धालुओं पर हुए आतंकी हमले के बाद देशभर में रोष है। आम जनमानस से लेकर तमाम क्षेत्रों की हस्तियां इसे कायराना और तमाम तरह की संज्ञाएं दे रही हैं। ऐसे भी तमाम लोग हैं जो निहत्थे श्रद्धालुओं पर हुए हमले पर हैरानी जता रहे हैं। यह हैरानी उन लोगों को ही है जिन्हें आतंकियों, अलगाववादियों और घाटी समेत देशभर के कट्टर इस्लामी तत्वों का अजेंडा मालूम नहीं है। असल में आतंकियों ने यह हमला सिर्फ भारत के विरोध में या कश्मीर की आजादी के अजेंडे के लिए नहीं किया है। यह हमला उस इस्लामी निजाम की स्थापना की राह में किया गया है जिसके लिए बुरहान वानी मारा गया, जिसके लिए 1990 से अब तक लाखों कश्मीरी पंडितों को बेदखल कर दिया गया। याद रहे कि खुद वानी की मां ने कहा था कि मेरा बेटा कश्मीर की आजादी नहीं बल्कि इस्लामी निजाम की स्थापना के लिए लड़ रहा था।

इस हमले पर हुर्रियत कॉन्फ्रेंस समेत कश्मीर के तमाम कट्टरवादी तत्वों ने संवेदना व्यक्त की है लेकिन यह सभी संवेदनाएं झूठी हैं। इसलिए क्योंकि ये ही वे लोग हैं जो खुद सालभर अमरनाथ यात्रा को बंद करने और उसकी अवधि कम करने के लिए आंदोलन करते हैं। जिन लोगों को अमरनाथ यात्रा से ही आपत्ति है वह आखिर इस पर हुए हमले से दुखी क्यों होंगे? अब सवाल यह है कि उन्हें अमरनाथ यात्रा से आपत्ति क्यों है? इसका बेहद सरल जवाब यह है कि इन यात्राओं को वह इस्लामी निजाम की स्थापना में सबसे बड़ा रोड़ा मानते हैं क्योंकि इससे जम्मू-कश्मीर की साझा संस्कृति मजबूत होती है। लेकिन जिन्हें सिर्फ इस्लामी निजाम या दारुल इस्लाम चाहिए वे अमरनाथ यात्राएं, खीर भवानी मंदिर पर लगने वाले मेले और शंकराचार्य मंदिर को कैसे बर्दाश्त करेंगे?

आपको याद दिलाना चाहूंगा कि लंबे समय से अलगाववादी श्रीनगर स्थित शंकराचार्य मंदिर का भी नाम बदलने की मांग करते रहे हैं। अलगाववादियों ने इसे तख्त-ए-सुलेमान का नाम दिया है। जनवरी 2016 से जनवरी 2017 तक जम्मू-कश्मीर अध्ययन केंद्र ने 10वीं शताब्दी के कश्मीर के दार्शनिक आचार्य अभिनवगुप्त की सहस्त्राब्दी का आयोजन किया। यह यात्रा देशभर से होते हुए श्रीनगर भी पहुंची जिसका अलगाववादियों ने तीखा विरोध किया। सोचने की बात है कि जिस कश्मीरी दार्शनिक का देशभर में प्रचार हो रहा था उससे अलगाववादियों को तो खुश ही होना चाहिए, फिर वे क्यों भड़के? ये लोग इसलिए भड़के क्योंकि दार्शनिक की सहस्राब्दी का अवसर यह याद दिला रहा था कि कश्मीर में कभी हिंदुओं की अच्छी-खासी संख्या थी और कट्टर इस्लाम के चलते परिवेश बदल गया है।

इन आतंकियों और अलगाववादियों का मंसूबा आजादी नहीं बल्कि गैर-इस्लामिक लोगों की बर्बादी है। कश्मीरी पंडितों की वापसी से इन्हें कष्ट है लेकिन रोहिंग्या और बांग्लादेशी मुसलमान इनकी गोद में खेलते हैं। अभिनवगुप्त की परंपरा को यह नकारते हैं लेकिन आतंकवादी इन्हें शहीद नजर आते हैं। ऐसी सोच रखने वाले लोगों द्वारा पाले गए तत्व जब अमरनाथ यात्रा पर हमला करते हैं तो वह उनकी कोई भूल नहीं है बल्कि अपने कुत्सित अजेंडे की ओर उनका एक कदम है। हैरानी तो हमें अपने उन सेक्युलर मित्रों और भोले राष्ट्रवादियों की सोच पर होनी चाहिए जो इस पर आश्चर्य जता रहे हैं। ध्यान रखें, यह इस्लामी निजाम की स्थापना की राह में आड़े आ रही अमरनाथ यात्रा पर हमला है। आप और हमारा अस्तित्व भी उनकी इस राह में रोड़ा है और हम आप भी इसीलिए उनके निशाने पर हैं।

बंगाल से कश्मीर घाटी तक एक है इनका अजेंडा
पश्चिम बंगाल के बशीरहाट में एक नाबालिग की विवादित पोस्ट पर 2,000 से ज्यादा कट्टर मुस्लिमों की भीड़ ने हिंदुओं के घर फूंक डाले। यह चिंता की बात थी। इससे भी चिंताजनक और आंखे खोलने वाले थे, उनके ‘आर्य भारत छोड़ो’ के नारे। ध्यान देने की बात है कि बशीरहाट जैसे इलाकों में मुस्लिम आबादी 65 फीसदी हुई और हिंदुओं के भारत छोड़ने के नारे लगने लगे। आबादी का यही गणित कश्मीर में भी है और इसी प्रकार के नारे गूंजते हैं। समझने की बात है कि जहां भी मुस्लिमों की आबादी अधिक है, वहां इस समाज का कट्टरवादी तबका दूसरे लोगों को मिटाने की कोशिश में जुट जाता है। कश्मीर से पश्चिमी उत्तर प्रदेश, बंगाल और केरल तक यही मानसिकता काम कर रही है। वह अपने अजेंडे से वाकिफ हैं और जी-जान से जुटे हैं। हम यदि नावाकिफ हैं तो यह हमारे भोलेपन और राष्ट्रीय नीति के भ्रमित होने का परिचायक है।

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किसी एक देश के दूसरे मुल्क से राजनयिक और सामरिक संबंध आखिर किस बुनियाद पर रखे जा सकते हैं? पीएम नरेंद्र मोदी के इजरायल दौरे के वक्त एक बार फिर यह सवाल उठ रहा है। क्या हमें देश के किसी समुदाय की कथित भावनाओं के आधार पर दूसरे मुल्क से संबंधों को विस्तार देना चाहिए या फिर राष्ट्रहित के लिए मित्रता का हाथ बढ़ाना चाहिए? मुझे लगता है कि मौजूदा भारत सरकार दूसरे विकल्प पर काम कर रही है। यही वजह है कि 70 साल में पहली बार, उससे पहले इजरायल ही अस्तित्व में नहीं था, भारत का कोई प्रधानमंत्री इजरायल के दौरे पर पहुंच रहा है। 14 मई, 1948 को इजरायल के गठन के बाद से भारत के संबंध उसके साथ लुका-छिपी वाले ही रहे हैं।

देश के पहले प्रधानमंत्री नेहरू से लेकर मोदी के पूर्ववर्ती मनमोहन सिंह तक के दौर में इजरायल से सिर्फ इस सोच के तहत ‘उचित दूरी’ बरती जाती रही कि इससे देश के मुसलमान नाराज हो जाएंगे। क्या दुनिया के सबसे बड़े लोकतांत्रिक और सेक्युलर की विदेश नीति तय करने के लिए इस प्रकार की सांप्रदायिक सोच सही थी? या फिर यह वोट बैंक की घरेलू राजनीति का विस्तार था, जो विदेश नीति पर भी साफतौर पर दिखता था। अब पीएम नरेंद्र मोदी ने इस छवि को तोड़ने की कोशिश की है तो इसकी सराहना की ही जानी चाहिए।

कागज पर नक्शा बनाने के बाद गठित किए गए दुनिया के पहले मुल्क इजरायल के भारत से संबंध उसके गठन से भी पुराने हैं। इजरायल के निर्माण के बाद दुनिया भर से जो यहूदी इजरायल पहुंचे, उनमें बड़ा हिस्सा भारत के केरल और महाराष्ट्र जैसे राज्यों से जाने वाले यहूदियों का भी था। इस प्रकार के भावनात्मक और सांस्कृतिक संबंधों की कड़ी को यदि हम मजबूती नहीं दे सके तो यह इजरायल की नहीं, बल्कि हमारी चूक थी। अपने गठन के बाद से अब तक पड़ोसी इस्लामिक देशों के प्रति संघर्षरत इजरायल की जनता और सत्ता प्रतिष्ठान ने हमेशा से भारत को अपने स्वाभाविक सहयोगी के तौर पर माना है। भले ही दोनों देशों के बीच नरसिम्हा राव सरकार तक राजनयिक संबंध लगभग ठप रहे हों, लेकिन भारत के एक बड़े वर्ग में इजरायल के प्रति हमेशा से सहानुभूति रही है।

हकीकत भी यही है कि भले ही हम इस्लामिक आतंकवाद को लेकर अमेरिका से अपने दर्द को कितना ही साझा करें और मदद की अपेक्षा करें। लेकिन, इजरायल हमारे इस दर्द में जितनी सहानुभूति रख सकता है, उतनी कोई दूसरा मुल्क नहीं। भारत-पाक विभाजन के बाद से जिस तरह का दर्द भारत को आतंकवाद और कट्टरवाद के रूप में पाकिस्तान से मिल रहा है, कुछ उसी तरह के संकट को इजरायल भी अपने गठन के बाद से ही अरब देशों से मिल रही चुनौतियों के तौर पर झेल रहा है।

इसी तरह जैसे भारत दक्षिण एशियाई क्षेत्र में एक तरह से इकलौता लोकतंत्र है, उसी प्रकार पश्चिम एशिया में मुस्लिम मुल्कों से घिरा इजरायल भी एकमात्र डेमोक्रिटेक देश है। यानी भारत और इजरायल की समस्याएं भी कुछ हद तक एक हैं और तासीर भी मिलती-जुलती है। ऐसे में जब दोनों देशों की समस्याएं एक समान हैं तो समाधान भी साझा किए जा सकते हैं। यदि फलस्तीन को तवज्जो और इजरायल से दूरी रखने वाली नेहरूवादी विदेशी नीति लंबे समय बाद किसी सरकार ने खारिज की है तो इसके तमाम लाभ हो सकते हैं।

आंतरिक और बाह्य सुरक्षा में इजरायल से ले सकते हैं सबक
इजरायल की आतंरिक सुरक्षा को दुनिया में अभेद माना जाता है। यूरोप के फ्रांस, जर्मनी, बेल्जियम और ब्रिटेन जैसे मुल्क जिस दौर में आतंकी हमलों से अछूते नहीं रहे, उस वक्त में इजरायल ने आतंरिक सुरक्षा के मोर्चे पर मिसाल पेश की है। सीमाओं की सुरक्षा की बात की जाए तो एक साथ कई अरब देशों की चुनौतियों से लगातार निपटकर इजरायल ने साबित किया है कि उसकी सीमाओं में सेंध लगाना कितना मुश्किल है। इजरायल से भारत इन दोनों मोर्चों पर सबक और तकनीकी सहायता ले सकता है।

इजरायल से सीख सकते हैं वॉटर मैनेजमेंट
इजरायल की 60 फीसदी भूमि रेगिस्तान है और बाकी इलाका में भी जल की उपलब्धता पर्याप्त नहीं है। लेकिन, समुद्री पानी के विलवणीकरण, गहरी बोरिंग, सीवेज का ट्रीटमेंट कर खेती में उपयोग, कम पानी की मांग वाली खेती और जल संरक्षण के उपायों से इजरायल ने जल संकट को मात दी है। 1948 के मुकाबले इजरायल में वर्षा का औसत तकरीबन आधा होने के बाद भी वहां पानी का संकट नहीं है। इजरायल ने प्रदूषित जल के ट्रीटमेंट में भी महारत हासिल की है। इजरायल से यदि हम जल प्रबंधन सीखें और गंगा जैसी नदियों के प्रदूषण को खत्म करने पर काम करें तो वह हमारे लिए आधुनिक दौर में भगीरथ साबित हो सकता है। गौरतलब है कि भारत दुनिया के उन इलाकों में से है, जहां जल के सबसे ज्यादा स्रोत हैं, लेकिन ये प्रदूषित हैं। इस समस्या से निपटकर भारत जल समृद्ध हो सकता है।

(नवभारत टाइम्स डॉट कॉम में प्रकाशित ब्लॉग)

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लालकृष्ण आडवाणी जैसे बीजेपी के संस्थापक सदस्य के लिए कांग्रेस समेत तमाम गैर-एनडीए दलों का प्रेम हमने बीते कुछ सालों में देखा है। पीएम नरेंद्र मोदी का राष्ट्रीय राजनीति में ज्वार आने के बाद से वयोवृद्ध आडवाणी समेत कई दिग्गज मार्गदर्शक (असल में मूकदर्शक) की भूमिका में हैं। लेकिन, हिंदूवादी खेमे की ऐसी राजनीति की अंतिम परिणति शायद यह देखना था कि प्रवीण तोगड़िया जैसे खांटी संघी और विहिप के अंतरराष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष के लिए भी कांग्रेस और हार्दिक पटेल हमदर्दी जताएं। 15 जनवरी को सुबह अचानक लापता हुए प्रवीण तोगड़िया देर रात एक अस्पताल में मिले और 16 जनवरी को मीडिया से बात कर उन्होंने सनसनी फैला दी।

उनका कहना था कि राजस्थान पुलिस की 16 टीमें उन्हें मुठभेड़ में मारने के लिए निकली थीं, इसलिए वह खुद अपना फोन स्विच ऑफ कर लापता हो गए थे। खैर, मैं इन तकनीकी पहलुओं की पड़ताल नहीं कर रहा कि वह कब, कहां और कैसे लापता हुए और मिले।

यहां मेरा सवाल वीएचपी, बीजेपी और संघ परिवार का हिस्सा कहे जाने वाले उन तमाम संगठनों से है, जो तोगड़िया प्रकरण पर चुप्पी साधे हुए हैं। फेसबुक और ट्विटर पर वर्तमान बीजेपी नेतृत्व के जुझारू समर्थक जरूर तोगड़िया को ड्रामेबाज करार देते हुए उन्हें ऑस्कर के लिए नॉमिनेट कराने की मांग कर रहे हैं। कोई हार्दिक पटेल के साथ उनकी पुरानी तस्वीरें शेयर कर उन्हें हिंदुत्व का खलनायक करार दे रहा है तो कोई कांग्रेस के साथ दोस्ती का अंजाम बता रहा है।

पीएम नरेंद्र मोदी से प्रवीण तोगड़िया की अदावत लंबे समय से चली आ रही है और जगजाहिर है। मोदी के गुजरात का सीएम रहते हुए विकास कार्यों के लिए कुछ मंदिर टूटे थे और इसके विरोध में उन्होंने वीएचपी का आंदोलन खारिज कर दिया था। यह सारी बातें सही हैं और एक ही संगठन में खेमेबाजी की बड़ी वजह हैं। लेकिन, क्या यह खेमेबाजी इतनी बढ़ जानी चाहिए कि सवाल उठाने वाले को आप खलनायक करार दे दें? प्रवीण तोगड़िया जैसे आज हैं, लंबे समय से वैसे ही हैं। डॉक्टरी छोड़ हिंदुत्व की राह में आने वाले तोगड़िया अकसर कहते रहे हैं कि मैं समाज की सर्जरी करने निकला हूं। वह मुसलमानों को देश के लिए समस्या करार देते रहे हैं। उनके तीखे भाषणों को संघी कार्यकर्ता खूब सराहते रहे हैं और उनके फायर ब्रैंड होने की मिसालें देते रहे हैं।

फिर अब अचानक क्या हुआ कि अब उन्हें ऑस्कर के लिए नॉमिनेट कराया जा रहा है? सिर्फ इसलिए कि आज जो सत्ता में हैं, उन्हें तोगड़िया पसंद नहीं हैं? ऐसा तो कल किसी और के साथ भी हो सकता है, क्या उस पर भी ऑस्कर भेजने का तंज कसा जाएगा? यह एक संगठन के गैंग में बदलने का संकेत है, जिसमें सरगना से बगावत का नतीजा ‘तपना’ ही होता है।

संजय जोशी, लालकृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी, शांता कुमार और अब प्रवीण तोगड़िया। इन सभी नेताओं के संघ परिवार के प्रति समर्पण पर कोई संदेह नहीं कर सकता। निजी अदावतें अपनी जगह हैं। फिर क्या निजी अनबन में किसी को इस तरह ‘ताप’ लेना चाहिए? यदि ऐसा है तो निश्चित तौर पर यह एक संगठन के गैंग में तब्दील होते जाने का संकेत है।

संगठन का अर्थ असहमतियों में सहमति तलाशना, नाराजगी में भी साथ की संभावनाएं खोजना होता है। पूर्व पीएम वाजपेयी भी कहा करते थे कि मतभेद होना चाहिए, लेकिन मनभेद नहीं। लेकिन, यहां तो मनभेद इस कदर दिखते हैं कि कल तक हिंदू हृदय सम्राट, लौह पुरुष और धरोहर जैसी उपमाएं पाने वाले पुरोधाओं का ही मजाक बनाया जाने लगा है। ऐसे में यदि कोई यह दर्द बयां करता है कि यह संगठन पहले जैसा नहीं रहा और मनमानी चलती है तो इस बात में दम लगता है। भले ही इस कार्यशैली से तमाम चुनाव जीत लिए जाएं, लेकिन लंबे समय के लिए यह टिकाऊ नहीं है और इसे एक परिपक्व संगठन की निशानी नहीं कहा जा सकता।

उन मां-बाप के दुर्भाग्य की सिर्फ कल्पना ही की जा सकती है, जिन्हें मीठी ईद से पहले अपने जिगर के टुकड़े को अंतिम विदाई देनी पड़ी। वह भी तब, जबकि उनके बेटे को मामूली झगड़े में कुछ लोगों ने पीट-पीटकर मार डाला हो। पलवल-मथुरा शटल में सफर कर रहे जुनैद के साथ जो हुआ, वह बर्बरता की हद है। ऐसी घटना और दोषियों की सभी पूर्वग्रहों, धर्म-पंथ के मतभेदों और राजनीतिक हितों से ऊपर उठकर निंदा की जानी चाहिए। लेकिन, इस मामले से भी शायद कुछ लोग सबक नहीं ले रहे और राजनीतिक तूल देने में जुटे हैं। ट्रेन में सीट को लेकर हुए झगड़े को पहले तो बीफ से जुड़ा मामला करार दे दिया गया, जिसे तमाम बड़े मीडिया घरानों ने धड़ल्ले से चलाया। फिर देश में शांति-सौहार्द्र और गंगा-जमुनी तहजीब के कथित झंडाबरदार हमलावरों की मानसिकता को देश के हिंदू समाज की मानसिकता में बदलाव का परिचायक बताने लगे। क्या ऐसा करना सही है?

junaid

मृतक जुनैद

यदि किसी धर्म को मानने वाले कुछ युवक ट्रेन में किसी घटना को अंजाम देते हैं तो क्या यह उनके पूरे समाज की मानसिकता को दर्शाता है? एक बड़े विदेशी मीडिया हाउस के स्वनामधन्य पत्रकार ने तो इसे हिंदू समाज के सैन्यीकरण की शुरुआत करार दिया है। तो क्या बीते कुछ सालों में एक वर्ग विशेष के युवाओं के इस्लामिक स्टेट से जुड़ने को पूरी कौम का आतंकी होना कहा जा सकता है? क्या रामपुर में एक समुदाय के कुछ युवकों द्वारा दलित युवतियों से बदसलूकी और उसका विडियो बनाने पर उनके पूरे समाज को शोहदा करार दिया जा सकता है? बिल्कुल नहीं। समाज और देश का संचालन सौहार्द्रपूर्ण सोच से होता है और इसे ही मुख्यधारा में जगह दी जानी चाहिए। जैसे किसी कुकर्मी पिता या भाई के रेपिस्ट होने से पूरे समाज को कटघरे में नहीं खड़ा कर सकते, वैसे ही किसी उपद्रवी की हरकत को पूरे समाज का सैन्यीकरण नहीं कहा जा सकता।

सवाल खड़े करता है अवॉर्ड वापसी गैंग का सक्रिय होना?
सीट के झगड़े को बीफ का विवाद करार देना और फिर अवॉर्ड वापसी गैंग का सक्रिय होना तमाम सवाल खड़े करता है। क्या यह एक युवक की दर्दनाक हत्या पर रोटियां सेंकने का प्रयास नहीं है? ऐसा हो सकता है कि इस तरह की प्रॉपेगैंडेबाजी से मुस्लिम समाज का एक तबका उनके साथ आ जाए, जो लोग इसे हिंदुओं की मानसिकता में बदलाव करार दे रहे हैं। लेकिन, इससे अविश्वास की खाई और बढ़ेगी, घटेगी नहीं।

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शोक संतप्त जुनैद के पिता

मेरा पैतृक घर रायबरेली में है। गाजियाबाद से अक्सर ट्रेन में आते-जाते वक्त मुरादाबाद और बरेली में अचानक अधिक सवारियों के आने पर सीट को लेकर कई बार कहा-सुनी होने लगती है। ये दोनों शहर मिली-जुली आबादी के हैं और सीट को लेकर झगड़ने वालों में सभी तबकों के लोग होते हैं। साफ है कि यह सिर्फ सीट पाकर आरामयदायक सफर के लालच में होता है। कई बार दूसरे को हड़काने वाला मुस्लिम होता है तो कभी हिंदू और कभी एक ही समुदाय के लोग सीट को लेकर उलझे दिखते हैं। तो क्या ट्रेन में सीट के इस विवाद को हम मुस्लिमों के ‘आतंकी’ होने और हिंदुओं के ‘सैन्यीकरण’ से जोड़ सकते हैं?

सीट के झगड़े को बीफ से जोड़ने वाले माफी मांगेंगे?
दुखद है कि खुद को पत्रकार और बुद्धिजीवी कहलाने वाले कुछ बौद्धिक विलासी लोग इस जुगत में लगे हैं। इससे उनके एसी दफ्तरों के वातानुकूलन पर तो कोई फर्क नहीं पड़ेगा, लेकिन सीट के झगड़े को बीफ का विवाद बताने से हजारों साल से बसीं बस्तियों में जरूर आग लग सकती है। मैं जुनैद के पिता की भावना को नमन करता हूं, जिन्होंने दुख की घड़ी में भी आगे बढ़कर कहा कि मेरे बेटे का कत्ल बीफ के चलते नहीं, बल्कि सीट के विवाद में हुआ। क्या सीट के झगड़े को बीफ से जोड़ने वाले लोग समाज से माफी मांगेंगे?

(नवभारत टाइम्स डॉट कॉम में प्रकाशित ब्लॉग)

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